अनमोल वचन

 

समाज में बुजुर्गों का अपमान करने वाले चावल की प्लेट में मिले कंकड के समान है। जिस दिन इन कंकडों को निकाल बाहर फेंक दिया जायेगा, उस दिन एक बेहतर समाज का निर्माण होगा, जो संस्कार और सभ्यता हमें संयुक्त परिवारों में सीखने को मिलती है वह एकल परिवार में सम्भव नहीं, परन्तु आज बुजुर्गों को अलग होने को बाध्य किया जा रहा है। यदि हमें युवा पीढी में संस्कार भरने हैं तो प्रवचनों की आवश्यकता नहीं। हमें संयुक्त परिवारों की प्रथा को अपनाना होगा। तभी तो कहा जाता है कि जब संग चले तीन पीढियां तो चढे विकास की सब सीढियां। पश्चिमी देशों की संस्कृति अपनाने की होड में आज हम अपनी संस्कृति और संस्कारों में पिछडते जा रहे हैं। एकल परिवार हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है। आज हम उन्हीं की उंगली छोडकर चलने लगे हैं, जिन्होंने उंगली पकडकर चलना सिखाया था। माता-पिता की हत्या, कलयुगी मां-बाप द्वारा अपने बच्चों को दादा-दादी से दूर रखना एवं मां-बाप को घर से बाहर निकलने को मजबूर करने, बल्कि निकालने जैसी शर्मनाक घटनाएं बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हमारी संस्कृति सिखाती है कि हम एक छत के नीचे रहकर अपने बुजुर्गों का सम्मान करें, सेवा करें, उन्हें किसी प्रकार का मानसिक कष्ट न हों।

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