वाराणसी-कोरोना काल की 'कसक' दीपावली पर पूरी होने की उम्मीद, तेजी से घूम रहे कुम्हारों के चाक

 

वाराणसी, 08 नवम्बर । कोरोना काल में रोजी रोटी के संकट से जूझ रहे कुम्हार दीपावली पर्व पर 'कसक' पूरी करेंगे। मिट्टी के संकट से जूझने बावजूद पर्व पर कुम्हार उम्मीदों की लौ जलाये दीये, भड़ेहर, घंटी और ग्वालिन बनाने में परिवार सहित जुटे हैं। रौशनी पर्व पर आधिपत्य जमाये चाइनीज झालरों के टूटते तिलिस्म के बीच उन्हें भरोसा है कि इस बार बिक्री अच्छी होगी। जिस तरह से सोशल मीडिया में चाइनीज सामानों के बहिष्कार की बातें हो रही है। उससे उनकी उम्मीदें भी बढ़ने लगी है। मिट्टी और गोहरी के बढ़े भाव से उनके उत्पाद के दाम भी बढ़ रहे हैं। इसको लेकर थोड़ा चिंतित भी है। इसके बावजूद साल भर के इस पर्व के लिए कुम्हार परिवार रात दिन एक कर रहा है। दीये के साथ लक्ष्मी- गणेश और कुबेर की मूर्तियों को गढ़ाई जारी है।

यहां शिवपुर निवासी प्रजापति समाज के घूरेलाल ने बताया कि कोरोना में हमारा व्यवसाय काफी काफी प्रभावित हुआ है। पिछले साल की तुलना में कोरोना के चलते आमलोग लोग भी परेशान है। ऐसे में लोग पर्व पर अगर परम्परा का निर्वहन नहीं करेंगे तो बिक्री कम होगी। दीये, भड़ेहर, घंटी और ग्वालिन का खर्च निकालना भी कठिन हो जाएगा। फिर भी उम्मीद है कि व्यवसाय अच्छा होगा।

पांडेयपुर के कुम्हार बस्ती के सत्यनारायण प्रजापति और सोहन ने बताया कि दीयों पर भी महंगाई का असर है। पहले वरूणा नदी से मिट्टी मिल जाती थी। अभी भी वहां से ट्रॉली और साइकिल से मिट्टी लाते हैं लेकिन जरूरत अधिक होने पर बाबतपुर हरहुआ से मिट्टी मंगाते हैं। पिछली बार की तुलना में मिट्टी और तैयार दीयों और भड़ेहर को पकाने के लिए गोहरी भी महंगी हो गई है। किसी तरह कर्ज लेकर पर्व पर दीया बनाने में जुटे हैं। उम्मीद है कि दीपावली पर कुछ कमाई हो जाएगी।

गौरतलब है कि रौशनी पर्व पर विद्युत झालरों के अधिक प्रयोग के बावजूद पूजा के लिए मिट्टी के लक्ष्मी गणेश, कुबेर, दीये आदि की जरूरत पड़ती है। गोधन पूजा में मिट्टी से बने भड़ेहर, घंटी और ग्वालिन का उपयोग होता है। इसका धार्मिक पक्ष भी है। पिछले चार पांच-साल से लोग दियों का भी प्रयोग कर रहे हैं। कुम्हार सशक्तिकरण योजना और विद्युत चालित चाक से भी परम्परागत सामान बनाने में तेजी आई है।

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