श्रीराम का नाम आदर्श जीवनपथ की उस अटल आस्था का नाम है जो सबसे कहलवा देती है ‘राम नाम जगत? आधारा, जो सुमिरै सोई उतरहि पारा । जब भी कोई विपदा आती है तो मुंह से ‘हे राम ही निकलता है और मान्यता है हर विपदा इससे दूर हो जाती है ।
कब जन्मे राम?
सुखसागर में राम का जन्म त्रेता में होना माना गया हैं, जिसके अनुसार कलियुग की अवधि 4,32,000 वर्ष है जो कि सबसे छोटा युग है, द्वापर उससे दोगुना व त्रेता उससे भी दोगुना होना मानते हैं इस तरह राम आज से 12 से 14 लाख वर्ष पूर्व हुए । एक अन्य विद्वान तो राम की जन्म तिथि 5414 ईसा पूर्व यानि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को ठहराते है ।
सबके पूज्य
हर वर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को श्रीराम का जन्म मनाया जाता है । राम भक्तों के लिए रामनवमी आस्था व विश्वास और अपने आराध्य के प्रति भक्ति का अवसर बनकर आता है। उनके लिए राम मर्यादाओं के पुनस्र्थापक एवं विष्णु के अवतार हैं ।
प्रभुतादायक
त्रेता में पैदा हुए राम के नाम पर आस्था के मेले लगाना और उनके नाम पर मंदिर बनाने मात्र के आश्वासन से ही जन – जन को लुभा लेना भारत जैसे अद्भुत देश में आम बात है। राम आज भी सत्ता व प्रभुता देने वाले एक बड़े कारक हैं ।
आदर्श के प्रतीक
मर्यादा पुरुषोत्तम राम, अयोध्या के राजा दशरथ के पराक्रमी बेटे, पितृ आज्ञा के पालक, दुष्टहंता, शोषितों, पीडि़तों के रक्षक, नारी का सम्मान करने व बचाने वाले नायक हैं। अपनी प्रजा के भावों को समझने व उनहे महत्ता देने वाले राम, निष्पक्ष न्याय के बल पर रामराज को आदर्श बना देने वाले ऐसे राजा थे जो अपनी पत्नी का त्याग इसलिए कर देते हैं जिससे प्रजा अपने राजा के प्रति कोई भी संशय न रख सके,और फिर उन्ही के वियोग में इसलिए जल समाधि लेकर देह भी त्याग देते हैं जिससे अनजाने में ही किए गए पाप का प्रायश्चित अपने प्राण भी देकर करने का आदर्श स्थापित हो सके तथा पत्नी के प्रति पति के कर्तव्यों का एक मानक समाज में प्रतिष्ठित किया जा सके। बेशक राम में कुछ तो ऐसा है ही कि वें कालपार होने का नाम नहीं लेते । विवादों में रहकर भी पूज्य बने रहते हैं । लाखों साल बाद भी श्रद्धा रूप में जीवित रहते हैं।
मूल्यों के वाहक
आज भी राम का नाम भारतीय संस्कृति, सभ्यता, संस्कारों के मूल्यों का प्रतीक है । सार रूप में कहें तो राम की छवि आज भी एक आदर्श पुत्र, पति, भाई व शासक की है और इसीसे प्रेरित आम आदमी रामराज के सपने पालता है।
सर्वगुण संपन्न
श्रीराम, भक्तों की दृष्टि में विष्णु के पूर्ण अवतार हैं , व्यवहारवादियों की नजऱ में वें व एक सर्वगुण संपन्न आदर्श मानव हैं । जनश्रुतियों व रामायण की कथा में राम अहिल्या, केवट, शबरी, सुग्रीव , जटायु या विभीषण जैसे हर आस्थावान पीडि़त पात्र को संकट से मुक्त करतें हैं । वें उनके के शाप, ताप,शोक व संताप हरते हैं ।
शस्त्र, शास्त्र ज्ञाता
श्रीराम की गुरु भक्ति व समर्पण अद्भुत है गुरु की आज्ञा का पालन वें पूरे समर्पण के साथ करते हैं । वशिष्ठ से वें शिक्षा व शास्त्रज्ञान लेते हैं तो विश्वामित्र से अल्प समय में ही शस्त्र विद्या सीख मायावी राक्षसों ताड़का, मारीच व सुबाहु जैसे आताताईयों का नाश कर डालते हैं ।
पराक्रमी
श्रीराम दुर्बलों को सताने, मारने तथा उनका शोषण करने वालों को पहले तो सत्पथ पर लाने का प्रयास करते हैं पर जब ऐसे लोग अत्याचार सीमा पार करने लगते हैं तब राम दुष्टहंता बन जाते हैं । सागर को सोंख लेने तक पर उतर आते हैं, अग्नि बाण साध लेते हैं, दूसरों की ताकत को ही अपनी ताकत बना प्रयोग करने वाले, दुराचारी बाली जैसों का छुपकर भी वध करने से परहेज नहीं करते हैं । स्त्री उद्धारक होने के उपरांत भी वें स्त्री जाति को बदनाम करने वाली ताड़का और लंकिनी का वध भी करते हैं ।
प्रजापालक
राम का व्यक्तित्व बहुआयामी है. वें धर्मनिरपेक्ष, जाति पांति तथा ऊंच नीच से दूर हैं । राजा के रूप में राम का कोई उपमान नहीं है । वें अपने राज्य की ऐसी व्यवस्था करते हैं कि रामराज्य आने वाले युगों के लिए भी एक आदर्श राज्य बन जाता है । राम स्वयं सादा जीवन उच्च विचार का पालन करते हैं पर अपनी प्रजा को सारी सुविधाएं व सुख देने में कोई कसर नहीं उठा रखते ।
आदर्श प्रबंधक :
संसाधनों का सही उपयोग सीखना हो तो राम आज भी एक आदर्श प्रबंधक हैं । राम ऐसे दक्ष सेनानानायक हैं जो दिव्य अस्त्र शस्त्रों से युक्त महाबली रावण को मायावी पुत्रों सहित महज बंदर भालुओं की मदद से परास्त कर देते हैं ।
श्रीराम राम कबीर के लिए निराकार हैं तो तुलसी के लिए साकार हैं । वाल्मीकि की प्रेरणा हैं, महाकवि कंब उन पर रीझते हैं तुलसी उनके भक्त हैं । सूर्यकांत त्रिपाठी व मैथिलीशरण जैसे कवि उन्हे कलियुग में भी प्रेरक मानते हैं ।
निस्संदेह श्रीराम के व्यक्तित्व कृतित्व चरित्र एवं कार्यों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है ।
डॉ0 घनश्याम बादल