ग्रीष्म ऋतु में हितकारी होता है शहतूत का फल

 
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ग्रीष्म ऋतु में पाए जाने वाले मौसमी फलों में शहतूत का अपना विशेष महत्त्व है। यह रसभरा, स्वादभरा स्वास्थ्यवर्द्धक मौसमी फल है। इसके सेवन से शरीर को तरावट और शीतलता मिलती है। इस ऋतु में पाए जाने वाले अन्य फलों की अपेक्षा इसका रस अधिक पौष्टिक होता है। इसके फलों का रस व शरबत गर्मी की उष्णता और तृष्णा का शमन करके शरीर को तरावट व शीतलता प्रदान करता है।
इसका वृक्ष बहुत बड़ा होता है। पत्ते अंजीर के पत्ते की तरह शिखायुक्त तथा नीम के पत्तों की तरह चारों ओर निशान वाले होते हैं। फल मंजरी में लगते हैं। इसके फल दो तरह के होते हैं। एक पीलापन लिए हरा तथा दूसरा  बैंगनीपन लिए काला होता है। एक को मोरस एल्ब तथा दूसरे को मोरस इंडिका कहा जाता है। गुणधर्म में दोनों एक समान होते हैं।
इसकी एक किस्म और होती है जिसे मोरस नायग्रा कहा जाता है। शहतूत की यह किस्म ब्लूचिस्तान में पाई जाती है। इसके फल में शर्करा, साइटरस और वसा आदि पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसके गुण-दोषों पर प्रकाश डालते भाव प्रकाश निघण्टू में  बतलाया  गया है:-
तूतम् पक्वं स्वादु पित्तानिलापहम्।
तदेवामाम गुरू सरमम्लोष्णं रक्तपित्त कृत।।
अर्थात पका तूत भारी, रूचिकर, ठंडा, पित्त और वायुनाशक होता है तथा कच्चा शहूतत भारी, शारक, खट्टा, गर्म, विरेचक और रक्तपित्त पैदा करने वाला होता है।
ग्रीष्म ऋतु में इसका सेवन हितकर होता है। यह गर्मी से शरीर का बचाव करता है। प्यास मिटाता है। ज्वर, जुकाम, चेचक, गले के रोग, पेट के कीड़े, प्रवाहिका तथा आंतों के व्रण में उसके सेवन से लाभ मिलता है। इसके पत्तों का क्वाथ बनाकर सेवन करने से गले की खराश मिटती है। शहतूत का प्रयोग करके अनेकों रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। इसकी छाल, पका फल, जड़, पत्ते व गुठली आदि सभी का औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यहां शहतूत के औषधीय उपयोग दिए जा रहे हैं:-
शहतूत का शर्बत सेवन करने से मस्तिष्क की कमजोरी दूर होती है और इसके ज्ञानतंतु मजबूत होते हैं।
25 से 5० ग्राम शहतूत के शर्बत मेंं एक रत्ती प्रवाल भस्म मिलाकर दिन में दो बार सेवन करने से हृदय की दुर्बलता मिटती है तथा शरीर को शीतलता मिलती है।
शहतूत का शर्बत पीने तथा एक छोटे चम्मच शर्बत आधा गिलास पानी मिलाकर गरारे करने से मुंह के छाले ठीक होते हैं। गले की ग्रंथियों की सूजन में भी लाभ मिलता है।
इसका शर्बत पीने से प्यास शांत होती है तथा रक्तपित्त का शमन होता है।
इसका नियमित सेवन मूत्र की दाह व जलन से छुटकारा दिलाता है।
शहतूत का फल सेवन कराने से नवप्रसूता स्त्री के स्तनों में दूध बढ़ जाता है।
इसकी पत्तों के क्वाथ से गरारे करने से गले की सूजन में लाभ मिलता है।
इसके ताजे फलों को लगातार 45-6० दिन तक सेवन करने से अपस्मार, पागलपन व हिस्टीरिया में लाभ मिलता है।
शहतूत का शर्बत बनाने की विधि:-
एक किलो जल में एक किलो पके शहतूत भिगो दें। इसे आग पर चढ़ाकर पकाएं। जब शहतूत में से रस निकल आए तो उसे आग से उतार लें। एक लीटर जल में दो किलो चीनी डालकर चाशनी तैयार कर लें। अब दोनों को एक साथ मिलाकर मन्द आग पर पकाएं। जब पककर मिश्रण में गाढ़ापन आने लगे तो आग से उतारकर सूती कपड़े से छान लें। जब छना द्रव ठंडा हो जाए तो बोतलों में भरकर रख लें। यही शहतूत का शर्बत है। आवश्यकतानुसार उपयोग करें।
-राजा तालुकदार

 

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