मां बाप का प्रभाव पड़ता है बच्चों पर

 
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सामाजिक विषमताओं के साथ-साथ समाज में जिस तेजी से नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है, उससे यही प्रतीत हो रहा है कि  हमारी महान सभ्यता और संस्कृति पर जबर्दस्त कुठाराघात हो रहा हैं। शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार ने रही सही कसर भी पूरी कर डाली है। ऐसे भ्रष्ट समाज में ममतामयी मां भी यदि बच्चों को नसीब न हो तो युवा पीढ़ी के भविष्य के प्रति किसी तरह की उम्मीद रखना सिवाए बेईमानी के और कुछ नहीं होगी।
बिगड़ी हुई व्यवस्था के लिए प्रमुख कारण संस्कारों का अभाव है। संस्कार शिक्षा के प्रति हमारी जरूरत से कहीं ज्यादा लापरवाही बहुत महंगी सिद्ध हुई है। संयुक्त परिवार में बिखराव की मुख्य वजह निजी स्वार्थ व संस्कारों का अभाव है। आपसी मन-मुटाव, कलह और सुविधाएं जुटाने की नीयत ही परिवार में सेंध लगाती है। साठ के दशक के बाद संयुक्त परिवार में बिखराव तेजी से हुआ है।
आज महिलाएं पुरूषों की तरह ही स्वतंत्र जीवन जीना पसंद कर रही हैं। उन्हें अपनी जिंदगी में किसी भी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होता। पहरावा, खान-पान  और बोल-चाल में स्वतंत्रता ही उनके लिए सब कुछ नहीं है। बच्चों को ऐसी स्थिति में न तो पिता का स्नेह मिल रहा है और न ही मां का दुलार।
कामकाजी महिलाएं दूध पीते बच्चों को महरियों के भरोसे छोड़कर नौकरी करने चली जाती है और शाम को ही लौटती हैं। घर पर उनके पास बच्चों के लिए समय नहीं होता है। बच्चों की ओर बूढ़ों की घर-परिवार में सबसे ज्यादा उपेक्षा की जा रही है।
बच्चों की भावना के साथ यदि उनके माता-पिता ही खिलवाड़ करते हैं तो बाहर वालों से अपेक्षा कैसे की जा सकती है। बुजुर्ग अपनी किस्मत कोस रहे हैं तो बच्चों से उनका बचपन छीना जा रहा है। ममतामयी मां बच्चों के लिए न केवल माता होती है बल्कि गुरु भी होती है। मां ही बच्चों में संस्कार डालती है और उन्हें नीति-अनीति का भेद समझाती है।
आज की माताओं के अंदर संस्कार कितने हैं, वे ही जानती हैं। ऐसी माताएं बच्चों में क्या खाक संस्कार डालेंगी। औरतों ने पुरूषों से बराबरी का अपना ध्येय पूरा किया अथवा नहीं, यह अलग बात है किंतु पुरूषों में व्याप्त उन सब बुराइयों को जरूर हासिल कर लिया है जिनकी वजह से घर-परिवार की शांति भंग होती रही है।
संयुक्त परिवार  के टूटने के साथ ही सुरक्षा की जगह असुरक्षा बढऩे लगी और मुश्किलें बढ़ती गई। देखते ही देखते स्थिति में बड़ी तेजी से बदलाव होने लगा। आज लोगों के पास पहले की तुलना में भले ही ज्यादा सुख-सुविधाएं हैं किंतु संतुष्टि दिनों दिन घटती जा रही है। संस्कारों के अभाव का परिणाम ही है कि युवा वर्ग दिशाहीन मार्ग की ओर अपने कदम बढ़ा रहे हैं। उनको कुशल मार्गदर्शन प्रदान करने वाले लोग नहीं रहे हैं।  
सवाल आज कुशल मार्गदर्शन का ही नहीं है बल्कि यह है कि युवा पीढ़ी के लडख़ड़ाते कदमों को कौन सहारा प्रदान करें। कुसंस्कारों से मुक्ति मिलना जरूरी है अन्यथा सभ्यता और संस्कृति के पतन की पूरे देश को बहुत महंगी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
-राजेन्द्र मिश्र राज

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