घर आए शत्रु का भी सम्मान करें

 
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शास्त्र जहाँ घर आए अतिथि का सत्कार करने के लिए कहते हैं, वहीं दूसरी ओर घर आए शत्रु का भी सत्कार करने के लिए भी समझाते हैं। यह हमारी भरतीय संस्कृति की विशेषता है जो हमें इस प्रकार अनुशासित करती है। शत्रु का स्वागत मनुष्य को उसी प्रकार करना चाहिए जैसे अतिथि का सत्कार करना चाहिए। उसका सत्कार करते समय मन में कटुता का भाव नहीं होना चाहिए और न ही चेहरे पर दुर्भावना की झलक होनी चाहिए। सामान्य रहते हुए उसका सत्कार करना चाहिए।
निम्न श्लोक में कवि ने पेड़ का उदाहरण देते हुए समझया है कि घर आए शत्रु का आदर करना चाहिए-
अरौ अपि उचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते।
छेतु: पार्श्वमगतां छायां न उपसंहरते द्रुमरू
अर्थात् अपने घर पर आए हुए शत्रु का सम्मान अतिथि की भाँति ही करना चाहिए। जो व्यक्ति पेड़ को काटनेे के लिए आता है, उसे भी वह अपनी शीतल छाया प्रदान करता है। पेड़ अपनी छाया उस काटने वाले व्यक्ति से दूर नहीं करता।
कवि के कहने का यह तात्पर्य है कि पेड़ शत्रु और मित्र में कोई अन्तर नहीं करता। पेड़ अपने शत्रु से फल और छाया को दूर नहीं करता बल्कि उसको अपनी छाया और अपने फल देकर तुष्ट करता है। यह वृक्ष की महानता है। कवि के अनुसार मनुष्य को भी पेड़ की भाँति विशलहृदय होना चाहिए। शत्रु को उसके व्यवहार से स्वयं ही ग्लानि हो जाएगी। वह विचार करने पर विवश हो जाएगा।
मनुष्य का सावधान रहना बहुत आवश्यक है। शत्रु पर मनुष्य विश्वास नहीं कर सकता। पता नहीं शत्रु किस कारण से घर आया है? उससे बात करके जान लेना चाहिए। हो सकता है, वाकई किसी समस्या के चलते वह घर आया हो। उसे कदापि यह अनुभव नहीं होने देना चाहिए कि उसकी उपस्थिति असह्य है। मनुष्य को उसका सत्कार सामान्य अवस्था में रहकर करना चाहिए।
जब उसे यह अहसास हो जाएगा कि जिस शत्रु के घर वह आया है, उसने उसका तिरस्कार नहीं किया। उसका सत्कार करने में पीछे नहीं रहा, तो उसके मन में सम्मान का भाव ही आएगा। वह अपनी बात या समस्या को बिना किसी झिझक के सामने रख सकता है। यदि उसकी समस्या का कोई निदान मनुष्य कर सकता है, तो कर देना चाहिए। यदि वह उसके लिए कुछ नहीं कर सकता तो विनम्रतापूर्वक मना कर देना चाहिए।
युद्ध का भी नियम है कि शत्रुपक्ष से आए हुए दूत का वध नहीं किया जाता, चाहे वह कितनी ही कटु बात क्यों न कहे। वह इसीलिए अवध्य होता है कि अपने स्वामी का सन्देश लेकर आया होता है। इसलिए शत्रु के घर आने पर उस शत्रु को शत्रु न समझकर अतिथि ही मानना चाहिए। उसी भाव से उसे देखना चाहिए। जब वह अपनी शरण में आ ही गया है तो उसका यथायोग्य सत्कार करना मनुष्य का दायित्व बन जाता है।
शत्रु यदि किसी के घर आया है, तो पता नहीं कितनी बार उसने विचार किया होगा, तब आया होगा। हो सकता है उसे कोई ओर उपाय नहीं सूझा होगा, तभी तो वह अपने शत्रु के घर पर आ गया है। उस समय उसके दोष को नगण्य कर देना चाहिए। सकारात्मक भाव मन में रखकर उससे व्यवहार करना चाहिए। इससे उस शत्रु के मन पर भी अच्छा प्रभाव पड़ेगा और जब वहाँ से जाएगा, तो अच्छी यादें ही लेकर जाएगा।
इस चर्चा का सार यही है कि मनुष्य के घर पर मित्र आए अथवा शत्रु, सबके लिए उसके द्वार खुले रहने चाहिए। उसे अपनी तरफ से व्यवहारकुशल बनना चाहिए। शत्रु के सम्मान में कमी नहीं रखनी चाहिए। शत्रु यदि घर आया है, तो यही सोचकर आया होगा। उसे लगा होगा कि फलाँ घर पर जाने से उसे अपमानित नहीं किया जाएगा। उसकी बात को ध्यान से सुना जाएगा। इसलिए अपनी महानता का परिचय देना चाहिए।
-चन्द्र प्रभा सूद

 

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