सर्दियों में खायें मक्खन और घी
 

 
दही को मथकर उसमें से सार रूप मक्खन निकाला जाता है। यह पचने में हल्का होता है और छूने में नरम होता है। यह सभी के लिए अमृत है। घी से शीघ्र हजम होने वाला होता है। ताजा मक्खन खाने से शरीर का सर्वतोमुखी विकास होता है। यह शीतल होता है। बुद्धि को बढ़ाता है, दस्त को रोकता है। ताजे मक्खन का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए। दीर्घकालीन बासी मक्खन खारा, तीखा और खट्टा होने से उल्टी बवासीर, मस्से, कफ और कुष्ठ करने वाला होता है, भारी तथा मेदवृद्धि करने वाला होता है। जहां तक संभव हो, बासी मक्खन का सेवन नहीं करना चाहिए। गाय:- गाय के मक्खन में विटामिन ए, सी, डी पाया जाता है। इसका मक्खन शरीर के लिए अत्यंत हितकारी होता है। यह मैथुनशक्ति को बढ़ाता है, दस्त को रोकता है। वायु पित्त, रक्त, बवासीर, खांसी आदि रोगों को दूर कर देता है। इसके मक्खन को तिल के साथ खाने से बवासीर मस्से के रोग में लाभ होता है। यह भूख बढ़ाता है। शरीर के रंग को तेजस्वी और आकर्षक बनाता है। सभी मक्खनों में गाय का मक्खन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। भैंस:- भैंस के मक्खन में विटामिन ए पाया जाता है। इसका मक्खन भारी, कफ और वायु करने वाला होता है। दाह, पित्त और थकान को दूर करता है। वीर्य और मेद को बढ़ाने वाला होता है। गाय के मक्खन की अपेक्षा भैंस का मक्खन कुछ देर से हजम होने वाला होता है। घी: मक्खन को आग पर गर्म करने से घी बनता है। मलाई में से निकाला हुआ घी मक्खन में से बने घी के सदृश गुणों वाला नहीं होता। घी चर्बी से युक्त है। यह शीघ्र पचता है और इसका रस रक्त में मिल जाता है। ताजा घी खाने में अधिक गुणकारी और रूचिकारक होता है। औषधि में पुराने घी का प्रयोग करते हैं। आयुर्वेद पुराने घी को सबसे अधिक सर्वश्रेष्ठ गुणकारी मानता है। पुराना घी उन्माद, कोढ़, मूर्छा, जहर, हिस्टीरिया और नेत्रों में धुंधलापन रोग को मिटाने वाला होता है। आग से जले हुए व्यक्ति के शरीर पर घी लगा देने से उसे आराम हो जाता है। घी में जख्म को दूर करने का विशेष गुण पाया जाता है। शुद्ध घी का दीया सुबह-शाम नियमित रूप से जलाने पर सूक्ष्म जंतु नष्ट हो जाते हैं, इसीलिए समस्त यज्ञों व पूजन में शुद्ध घी का प्रयोग किया जाता है। गाय:- गाय के घी में विटामिन ए होता है। शीतल होता है। आंखों के लिए लाभदायक होता है। यह मैथुनशक्ति को बढ़ाने वाला होता है। अग्नि प्रदीप्त करने वाला होता है। कफ, पित्त, वात को दूर करता है। युवावस्था को स्थिर रखने वाला होता है। गाय का घी सर्वश्रेष्ठ माना गया है। नाक से खून गिरता हो तो इसके घी की कुछ बूंदें नाक में डालने से खून आने की शिकायत को ठीक कर देता है। आधासीसी रोग में सात दिनों तक सुबह-शाम इसके घी का नस्य लेने या नाक में कुछ बूदें डालने से ठीक हो जाता है। गाय का गुनगुना घी पीने से हिचकी बंद हो जाती है। गाय के घी में गाय का दूध मिलाकर पीने से तृषा रोग मिट जाता है। धतूरा या रस कपूर का विष फैल गया हो तो गाय का घी अधिक मात्रा में पीने से विष में लाभ मिलता है। भैंस:- भैंस के घी में विटामिन ए होता है। इसका घी मधुर, शीतल, कफकारक, रक्तपित्तनाशक, मैथुनशक्ति को बढ़ाता है। संग्रहणी, बवासीर और मस्से में लाभ देता है और शरीर का मोटापा बढ़ाने वाला होता है। भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से ही गोरस का महत्त्व रहा है। दूध, दही, छाछ, मक्खन और घी को गोरस कहते हैं।

दही को मथकर उसमें से सार रूप मक्खन निकाला जाता है। यह पचने में हल्का होता है और छूने में नरम होता है। यह सभी के लिए अमृत है। घी से शीघ्र हजम होने वाला होता है। ताजा मक्खन खाने से शरीर का सर्वतोमुखी विकास होता है। यह शीतल होता है। बुद्धि को बढ़ाता है, दस्त को रोकता है। ताजे मक्खन का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।

दीर्घकालीन बासी मक्खन खारा, तीखा और खट्टा होने से उल्टी बवासीर, मस्से, कफ और कुष्ठ करने वाला होता है, भारी तथा मेदवृद्धि करने वाला होता है। जहां तक संभव हो, बासी मक्खन का सेवन नहीं करना चाहिए।

गाय:- गाय के मक्खन में विटामिन ए, सी, डी पाया जाता है। इसका मक्खन शरीर के लिए अत्यंत हितकारी होता है। यह मैथुनशक्ति को बढ़ाता है, दस्त को रोकता है। वायु पित्त, रक्त, बवासीर, खांसी आदि रोगों को दूर कर देता है। इसके मक्खन को तिल के साथ खाने से बवासीर मस्से के रोग में लाभ होता है। यह भूख बढ़ाता है। शरीर के रंग को तेजस्वी और आकर्षक बनाता है। सभी मक्खनों में गाय का मक्खन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

भैंस:- भैंस के मक्खन में विटामिन ए पाया जाता है। इसका मक्खन भारी, कफ और वायु करने वाला होता है। दाह, पित्त और थकान को दूर करता है। वीर्य और मेद को बढ़ाने वाला होता है। गाय के मक्खन की अपेक्षा भैंस का मक्खन कुछ देर से हजम होने वाला होता है।

घी: मक्खन को आग पर गर्म करने से घी बनता है। मलाई में से निकाला हुआ घी मक्खन में से बने घी के सदृश गुणों वाला नहीं होता। घी चर्बी से युक्त है। यह शीघ्र पचता है और इसका रस रक्त में मिल जाता है। ताजा घी खाने में अधिक गुणकारी और रूचिकारक होता है। औषधि में पुराने घी का प्रयोग करते हैं। आयुर्वेद पुराने घी को सबसे अधिक सर्वश्रेष्ठ गुणकारी मानता है।

पुराना घी उन्माद, कोढ़, मूर्छा, जहर, हिस्टीरिया और नेत्रों में धुंधलापन रोग को मिटाने वाला होता है। आग से जले हुए व्यक्ति के शरीर पर घी लगा देने से उसे आराम हो जाता है। घी में जख्म को दूर करने का विशेष गुण पाया जाता है। शुद्ध घी का दीया सुबह-शाम नियमित रूप से जलाने पर सूक्ष्म जंतु नष्ट हो जाते हैं, इसीलिए समस्त यज्ञों व पूजन में शुद्ध घी का प्रयोग किया जाता है।

गाय:- गाय के घी में विटामिन ए होता है। शीतल होता है। आंखों के लिए लाभदायक होता है। यह मैथुनशक्ति को बढ़ाने वाला होता है। अग्नि प्रदीप्त करने वाला होता है। कफ, पित्त, वात को दूर करता है। युवावस्था को स्थिर रखने वाला होता है। गाय का घी सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

नाक से खून गिरता हो तो इसके घी की कुछ बूंदें नाक में डालने से खून आने की शिकायत को ठीक कर देता है। आधासीसी रोग में सात दिनों तक सुबह-शाम इसके घी का नस्य लेने या नाक में कुछ बूदें डालने से ठीक हो जाता है।

गाय का गुनगुना घी पीने से हिचकी बंद हो जाती है। गाय के घी में गाय का दूध मिलाकर पीने से तृषा रोग मिट जाता है। धतूरा या रस कपूर का विष फैल गया हो तो गाय का घी अधिक मात्रा में पीने से विष में लाभ मिलता है।

भैंस:- भैंस के घी में विटामिन ए होता है। इसका घी मधुर, शीतल, कफकारक, रक्तपित्तनाशक, मैथुनशक्ति को बढ़ाता है। संग्रहणी, बवासीर और मस्से में लाभ देता है और शरीर का मोटापा बढ़ाने वाला होता है।
भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से ही गोरस का महत्त्व रहा है। दूध, दही, छाछ, मक्खन और घी को गोरस कहते हैं।

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