मालिश से यौवन को निखारिये

-  पूनम दिनकर
 
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मालिश का अपना अलग ही महत्त्व है। मालिश योग का अंतिम तथा आठवां सूत्र है। शरीर की घर्षण विधि को ही मालिश कहा जाता है। अखाड़े में लडऩे वाले पहलवान नियमित रूप से मालिश करके अपने अंगों को पुष्ट व शक्तिशाली बनाए रखते हैं। मालिश करने से शरीर की पेशियों को उचित पोषण व व्यायाम की प्राप्ति होती है तथा वे सक्रिय रहते हुए यौवन को बरकरार रखने में सहायक होती हैं।

मालिश द्वारा शरीर का तंत्रिका-तंत्र तथा रक्तसंचरण तंत्र तंदुरूस्त व सक्रि य रहता है। मालिश द्वारा शरीर की मांसपेशियों तथा बाह्य त्वचा में स्थित नाड़ियों में तनाव उत्पन्न होकर नाड़ियों के फैलने से शरीर के बाह्य स्तर की ओर रक्त संचार बढ़ता है। मालिश से शरीर की त्वचा पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। घर्षण द्वारा त्वचा के रोमकूप खुलते हैं तथा त्वचा से दूषित पदार्थों का निष्कासन होने से शरीर विषरहित होकर स्वास्थ्य की ओर कदम बढ़ाता है।

सम्पूर्ण अंगों में नित्य प्रति तेल का लगाना पुष्टिकारक माना जाता है। विशेषकर सिर में व कानों में तेल को डालना लाभप्रद माना जाता है। सरसों का तेल, अग्नि के संयोग से सुगन्धित पदार्थों का निकाला हुआ तेल, चम्पा, चमेली, बेला, जुही आदि पुष्पों से सुगन्धित किया हुआ तेल शरीर के यौवन को निखारने में अति सहायक होते हैं। अत: इन तेलों से मालिश कर अंगों की चमक को बढ़ाया जा सकता है।

आयुर्वेद में सबसे उत्तम घी की मालिश को बताया गया है। वैसे नारियल या तिल के तेल की मालिश भी उपयुक्त रहती है। वातविकृति को दूर करने के साथ ही उदर संबंधी अनेक रोगों में भी मालिश का अत्यंत महत्त्व है। कई तरह की सूजन तथा अन्य विकृतियां जो शरीर में जाने-अनजाने हो जाया करती हैं, उन सभी का शमन मालिश द्वारा संभव हो सकता है।

जो स्त्री तेल या घी से नियमित रूप से अपने स्तनों की मालिश नीचे से ऊपर की ओर करती रहती है, उसके स्तन कभी भी लटकते नहीं। दो अंगुलियों के सहारे योनि के अंदरूनी भाग की नियमित तेल मालिश करते रहने से योनिगत विकार पनप ही नहीं पाते। श्वेतप्रदर आदि से बचाव का यह सहज तरीका हो सकता है।

मालिश की शुरूआत किस तरह और शरीर के किस अंग से ही की जानी चाहिए, यह भी एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। तेल या घी से भीगी हाथ की अंगुलियों से धीरे-धीरे रगड़ते हुए वक्ष अर्थात् छाती से मालिश की शुरूआत होनी चाहिए। चूंकि यह हिस्सा शरीर के केन्द्रीय क्षेत्र में है और अग्नि अर्थात् ऊर्जा इसी क्षेत्र में स्थित है, अत: इस भाग की मालिश अच्छी तरह होनी चाहिए। कमर से ऊपर छाती की ओर तथा कमर से नीचे पांव की ओर मालिश की जानी चाहिए।

आजकल लोग आधुनिकता के चश्चर में पड़कर मालिश से दूर ही रहना चाहते हैं। साबुन का प्रयोग अंधाधुंध करते हैं परन्तु तेल लगाने को हीन दृष्टि से देखते हैं। यही कारण है कि आज के युवाओं में स्फूर्ति की कमी पायी जाती है, साथ ही सैक्स की कमज़ोरी, नपुंसकता, शीघ्रपतन, स्तन शिथिलता आदि व्याधियां भी घेरे रहती हैं। शीतकाल में धूप में बैठकर अंगों की मालिश करने से शरीर की चमक में वृद्धि होती है। मालिश करते समय निम्नांकित बिन्दुओं पर भी ध्यान रखना अति आवश्यक होता है।

मालिश का स्थान खुला तथा हवादार होना चाहिए। मालिश के तुरंत बाद वातानुकूलित कक्ष या पंखे के नीचे नहीं जाना चाहिए।

मालिश के तुरन्त बाद स्नान नहीं करना चाहिए। कम से कम मालिश के एक घंटे बाद शरीर को मल-मलकर, रगड़कर स्नान करना चाहिए।

मालिश से आये पसीने के तुरन्त बाद स्नान करने से वजऩ में जादुई तौर से कमी आती है परन्तु ऐसा वही करें जिनका शरीर तुरंत पैदा होने वाले बदलाव को सहने की क्षमता रखता हो।

मालिश करने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए परन्तु मालिश के तुरन्त बाद पेशाब करने से शरीर के विकार पेशाब के साथ निकल जाते हैं।

शरीर के मालिश के तुरन्त बाद संभोग करना या हस्तमैथुन करना नपुंसकता, बांझपन के साथ ही अन्य यौन रोगों को पैदा कर सकता है।

मालिश बुढ़ापे को रोककर शरीर का सर्वांंगीण विकास करते हुए यौवन को निखारने वाला सुलभ व सहज साधन है।

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