शीत ऋतु में सेहत बनायें
 

- पं. घनश्याम प्रसाद साहू

 
शीत ऋतु में सेहत बनायें

शीतकाल में जठराग्नि प्रबल होने से भूख खूब लगती है और खाने की रूचि भी बढ़ जाती है, अत: इस ऋतु में पौष्टिक आहार लेना चाहिए ताकि शरीर शक्तिशाली और चुस्त बना रह सके।

यह ऋतु सेहत बनाने के लिए बहुत अच्छी होती है। शीतकाल में एक तो वातावरण शीतल होता है, दूसरे पाचनशक्ति प्रबल रहती है। इस कारण बलवीर्यवर्द्धक एवं पौष्टिक पदार्थों से युक्त आहार एवं अच्छे बाजीकारक नुस्खों का सेवन करके ताकतवर बनना चाहिए।

सेहत बनाने के लिए निम्नांकित बातों का ध्यान रखें:-

सुबह जल्दी उठें और शौचादि से निवृत्त होकर शरीर के अनुकूल आसन और व्यायाम करें।

जो व्यायाम करने में असमर्थ हैं, वे सैर करें। प्रात: काल की शुद्ध वायु का सेवन तथा तेल मालिश द्वारा बिगड़े स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है।

सुबह नाश्ते में काजू-बादाम, केला, भीगा हुआ चना, सलाद, दूध, घी लेना चाहिए।

भोजन में घी, दूध, चावल, उड़द, नारियल, मलाई, मक्खन, शहद, मौसमी फल, हलवा, हरी साग-भाजी, टमाटर, गाजर, आंवला आदि का सेवन करना चाहिए।

औषधियों में च्यवनप्राश, शिलाजीत, मूसली पाक, असगंध, कौंच-पाक, सेमल पाक, कुमारी आसव व आंवला मुरब्बा लाभकारी है।

बलवर्द्धक द्रव्यों में बादाम का लवा, दूध में पकाया हुआ छुहारा, मीठा अनार, प्याज का रस, नारियल की गिरी और दूध की खीर, उड़द दाल का लड्डू, गन्ना रस, सोंठ और कालीमिर्च तथा मेथी का लड्डू का सेवन बहुत फायदेमंद है किंतु योग्य वैद्य की सलाह अवश्य लेनी चाहिए ताकि अपने शरीर के अनुकूल पथ्य-अपथ्य का चयन किया जा सके।

चिकनाई युक्त, मधुर, लवण और अम्ल रस वाले पदार्थों का सेवन करके अपना स्वास्थ्य बनाये रखना और बासी, दुर्गंधयुक्त, अधिक चटपटा मसालेदार खानपान से बचना ही श्रेयस्कर है।

साथ ही ठीक समय पर चबा-चबा कर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करना चाहिए। भोजन के पूर्व नींबू पानी और भोजन के पश्चात् छाछ पीना लाभदायक होता है।

इस ऋतु में रूखे, कटु-तिक्त-कषाय अति शीतल और वात प्रधान भोज्य पदार्थ न खायें अन्यथा जोड़ों के दर्द, गठिया और सायटिका से पीडि़त हो सकते हैं।  इसी प्रकार अधिक खटाई से भी बचें ताकि खांसी, सर्दी-जुकाम, नजला आदि के शिकार होने से बचाव हो सके। इमली, अमचूर, आम के अचार और खट्टा दही न खायें। नींबू और ताजा दही वर्जित नहीं है।

शीतऋतु में अधिक देर तक भूखे न रहें क्योंकि जठराग्नि की प्रबलता के कारण यथा समय भोजन नहीं करने से यह अग्नि शरीर के धातुओं को जला डालती है जिससे जीवन शक्ति का क्षय होता है।

अधिक सोना-जागना, दिन में सोना या अधिक सर्दी में अधिक घूमना हानिकारक है अत: इससे बचें।

सेहत बनाने के लिए प्रतिदिन स्नान भी जरूरी है। कुछ लोग ठंड के डर से कई दिन तक नहाते नहीं, यह उचित नहीं। अत्यधिक ठंडा और अधिक गर्म पानी नुकसान पहुंचाता है।

मल-मूत्र विसर्जन में आलस्य नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार रात को सिर ढककर सोना भी उचित नहीं होता।

शाम को भोजन के पश्चात् देर रात जागना या खुले बदन घूमना हानिकारक है किंतु सुबह की धूप जरूर लें।

इस ऋतु में आलस्य खूब आता है और बिस्तर में दबे रहने का इरादा होता है लेकिन आलस्य करना ठीक नहीं। इस ऋतु में अपना काम-काज खूब परिश्रमपूर्वक करना चाहिए।

चूंकि यह सेहत बनाने की ऋतु है अत: किसी योग्य वैद्य से वीर्यवर्द्धक पौष्टिक नुस्खा बनवाकर सेवन करना चाहिए।

उपरोक्त विषयों पर अमल करके आप तंदुरूस्त और बलवान बन सकते हैं।

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