भाग्य से मिलती है बेटियां

 
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बेटी का जन्म किसी  के घर उस समय पर होता है जब उनके भाग्य में पुण्यकर्मों की अधिकता होती है अथवा उनका उदय होता है। कितने ही ऐसे लोग हैं, जो एक बेटी के लिए तरसते हैं। उसके लिए जगह-जगह जाकर मन्नतें मांगते हैं, ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि वह उनकी झोली में बेटी को उपहार स्वरूप डाल दे। जब उनके घर बेटी का जन्म होता है, तो वे खुशियाँ मनाते हैं।
वे बेटी के जन्म के उपलक्ष्य में पार्टी करते हैं, बन्धु-बान्धवों को उपहार देते हैं। उसके लिए शास्त्र सम्मत संस्कार करते हैं। उसकी हर इच्छा को पूर्ण करना अपना धर्म समझते हैं। अपनी हैसियत के अनुसार उसे अच्छे स्कूल में पढऩे के लिए भेजते हैं। बेटी को उच्च शिक्षा दिलाकर वे उसका भविष्य संवारने में लगे रहते हैं। जब उनकी बेटी पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाती है, तब वे अपने इस जीवन को धन्य हो गया मानते हैं।
घर में बेटी सदा अपनी माता की सहायता के लिए तत्पर रहती है। वह घर की सार-संभाल करती है। उसे सजाकर रखने का प्रयास करती है। समय-समय पर माता-पिता को परामर्श देती रहती है और उनके साथ जाकर घर के लिए खरीदारी भी करती है। उसे यही लगता है कि घर पर आने-जाने वाले सभी लोग उनके सलीके से सजे हुए घर की प्रशंसा करें।
बेटी उच्च शिक्षा ग्रहण करके जब उच्च पद पर कार्यरत होती है तो उसके माता-पिता की प्रसन्नता का पारावार नहीं होता। यही बेटियां समय पडऩे पर अपने माता-पिता की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में दिन-रात एक कर देती हैं। वे अपने नालायक भाइयों के भरोसे शारीरिक रूप से असहाय होते हुए भी माता-पिता को दर बदर की ठोकरें खाने के लिए कदापि अकेला नहीं छोड़तीं अपितु उनके बुढ़ापे की लाठी बनकर उनकी सेवा करती हैं। उनकी जिम्मेदारी ओटती हैं।
अनेक परिवारों में ऐसा देखा गया है, जहां सबसे बड़ी बेटी माता अथवा पिता की मृत्यु, घर की खस्ताहाल स्थिति आदि किसी भी कारण से अपने छोटे भाई-बहनों को पढ़ाने, उन्हें सेटल करने और उनके विवाह करने की जिम्मेदारी लेते हुए अपना सारा जीवन व्यतीत कर देती है। अपनी सारी खुशियों का बलिदान कर देती है। इन सभी जिम्मेदारियों को निभाते हुए वह कब युवा से वृद्ध हो जाती है, उसे पता ही नहीं चलता।
बेटी के माता-पिता की आर्थिक स्थिति जब उसके ससुराल के मुकाबले अच्छी नहीं होती, तब वह उनकी इज्जत रखती है। अपने पास से धन खर्च करके कह देती है कि उसे मायके से मिला है। बेटी की महानता इससे भी प्रकट होती है कि वह अपने माता-पिता के धन-दौलत को बिना माथे पर शिकन लाए, हंसते हुए अपने भाई के लिए छोड़ देती है, उसकी स्वयं की स्थिति चाहे कितनी ही खस्ता क्यों न हो।
समाज में कुछ अपवाद अवश्य मिलते हैं, जहां बेटियां अपनी पैतृक सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाती हैं। ऐसी बेटियों का मायके से अलगाव हो जाता है और उनका अपने भाई-बहनों से भी सम्बन्ध विच्छेद भी हो जाता है। इसके विपरीत कुछ गिने-चुने ही माता-पिता ऐसे हैं, जो स्वेच्छा से बेटियों को अपनी सम्पत्ति का कुछ भाग उपहार में देते हैं।
चाहे बेटियाँ अपने माता-पिता के पास रहें या रोजी-रोटी के कारण अपने परिवार के साथ देश-विदेश में कहीं अन्यत्र रहें, उनकी चिन्ता बेटियों को सदा रहती है। वे बस यही चाहती हैं कि उनके भाई-भाभी माता-पिता की देखभाल अपना दायित्व समझकर करें। उन्हें बोझ मानकर उनकी अवहेलना न करें। अन्त में यही कहना चाहूंगी कि बेटियाँ मनुष्य को सौभाग्य से ही मिलती हैं। उनका सदा ही सम्मान करना चाहिए।
- चन्द्र प्रभा सूद

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