नारी जीवन में परिवर्तन लाता है संधिकाल !

 
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संधिकाल अर्थात रजोनिवृत्ति का स्त्री जीवन में कोई खास समय मुकर्रर नहीं होता। यह नारी जीवन के तीसरे दशक के अंत से छठे दशक के शुरू तक कभी भी हो सकता है। यह व्यक्तिगत भिन्नता का मसला है जिसमें देश, स्वास्थ्य काल सभी की अहम् भूमिका है। इसके अलावा आनुवांशिकी का भी इसमें हाथ होता है। रजोनिवृत्ति की पहचान है मासिक स्राव का बंद होना और इसके साथ ही गर्भधारण की क्षमता का भी समाप्त हो जाना।
 यह प्रक्रिया भिन्न-भिन्न तरीके से हो सकती है जैसे माहवारी की अवधि बढ़ते-बढ़ते एकदम बंद होना या माहवारी में रक्तस्राव कम होते-होते बिल्कुल रूक जाना। ऐसा भी हो सकता है कि माहवारी अचानक ही बंद हो जाए। अगर छह सात माह तक माहवारी न हो तो इसे स्थायी सिचुएशन मान लेना चाहिए। संधिकाल स्त्री जीवन में कयामत बनकर आता है। इससे निपट पाना उसके लिये इतना आसान नहीं होता। ऐसे में भावनाओं का उद्वेलन, बेहद इमोशनल हो जाना, स्वभाव का चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, असहनशीलता, हर समय रोने का मन, बात-बात में गुस्सा करना जैसी बातें साधारण बात है। इतना ही नहीं, यह हालत स्त्री को कई बार विक्षिप्तता की कगार पर ला खड़ा करती है और कई बार वह अपना मानसिक संतुलन तक खो बैठती हैं। हारमोन असंतुलन बहुत सी व्याधियों को जन्म देता है।
हॉट फ्लशेज, दिल की धड़कनों का तेज होना, छाती में दर्द उनमें से कुछ हैं। इसके अलावा ठंडे पसीने आना, हाथ पैर में चुभन तथा पाचन में गड़बड़ जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ये प्रक्रियाएं अस्थायी होती हैं इसलिए इनसे घबराने की जरूरत नहीं। हां, अगर समस्या कुछ ज्यादा ही हो तो चिकित्सक से परामर्श लिया जा सकता  है लेकिन ध्यान रहे कि ऐसे में मनोबल ही ज्यादा सहायक होता है। संधिकाल के बारे में सही जानकारी होना इसीलिए जरूरी है ताकि इसे फेस किया जा सके। अनभिज्ञता औरत को मुसीबत में डाल सकती है। वह आशंकाओं से घिरी न जाने अपने बारे में क्या-क्या गलतफहमी पाल सकती है जबकि प्रकृति उसे स्वयं ही बदलावानुसार ढाल देती है। सिर्फ थोड़े धैर्य और समझदारी की जरूरत है।
संधिकाल का असर स्त्री के यौन जीवन पर सबसे अधिक पड़ता है। कुछ स्त्रियों में जहां यौन शीतलता आ जाती है, कुछ में रति सुख की इच्छा बलवती हो जाती है। प्रजनन क्षमता समाप्त होने से उनकी यौनेच्छा कम नहीं होती। इसमें कहीं उनका यह विश्वास भी जुड़ा होता है कि अब अनचाहे गर्भ का डर नहीं।
संधिकाल जीवन का ऐसा पड़ाव है जिससे हर स्त्री को गुजरना ही पड़ता है। वह इसका सामना रोकर करने की बजाए हिम्मत से हंसते हुए करे, इसी में उसकी और परिवार की भलाई है। एलोपैथी भी ऐसी अवस्था में ज्यादा कुछ नहीं कर पाती, उल्टा नुकसान होने के चांस ज्यादा हैं। यह नाजुक मसला है इसलिए किसी नौसिखिए डॉक्टर से परामर्श कदापि न लें। आयुर्वेद और होमियोपैथी की हल्की दवा ली जा सकती है।
इस परिवर्तन को शालीनता से गुजर जाने दें। अपने मन को रचनात्मक कार्यो की ओर उन्मुख करेंगी तो मुश्किल समय बीतता नजर आयेगा। हां, एक बात और, ऐसे वक्त यथासंभव अकेलेपन से बचें।
- उषा जैन 'शीरीं'

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