14 साल से जेल में बंद कैदियों को रिहा करने पर विचार करे केंद्र, राज्य सरकारः सुप्रीम कोर्ट

 
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नयी दिल्ली- उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि देश की आजादी के 75वें जश्न के मौके पर 10 सालों से जेल में बंद (खासकर कमजोर, आर्थिक व सामाजिक परिवेश से आने वाले) कैदियों को रिहा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कुछ उपाय करने चाहिए।

न्यायमूर्ति एस. के. कौल और न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश की पीठ ने एक मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सलाह दिया कि 10 सालों से जेल में बंद कैदियों को जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए, जबकि 14 वषों से जेल में बंद कैदियों की सजा में छूट पर विचार किया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा यदि संभव हो तो सभी राज्य सरकारों के लिए एक समान छूट की नीति विकसित किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि ऐसे मामले, जिनमें राज्य सरकारों को कुछ अभियुक्तों को जमानत देने में आपत्ति है (जिन्होंने जेल में 10 साल या उससे अधिक समय बिताया है), उन मामलों की अलग से जांच की जा सकती है।

शीर्ष अदालत ने कहा, “हम आजादी के 75वां साल मना रहे हैं। राज्य सरकारों द्वारा कुछ कार्रवाई क्यों नहीं की जा सकती है, यह उस मुद्दे पर गौर करने का उपयुक्त समय है, जहां कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण एक आरोपी लंबे समय से जेल में है।”

शीर्ष अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज को इस मुद्दे पर चर्चा शुरू करने के साथ-साथ कुछ लीक से हटकर सोचने का सुझाव दिया और कैदियों के अच्छे व्यवहार को भी उनकी रिहाई के लिए एक शर्त के रूप में माना जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य और केंद्र सरकारों की इन पहलों से कई मामलों में निचली अदालतों का बोझ कम होगा।

पीठ ने कहा कि अमेरिका में प्रचलित ‘प्ली बार्गेन’ का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कभी-कभी यह काम नहीं कर सकता है, क्योंकि सजा का सामाजिक कलंक आरोपी को अपराध स्वीकार नहीं करने के लिए मजबूर कर सकता है।

शीर्ष अदालत ने उत्तर प्रदेश में कैदियों की याचिकाओं और जमानत देने की नीतिगत रणनीति के संबंध में स्वत: संज्ञान लेने से संबंधित मामले को 14 सितंबर को आगे के विचार के लिए रखा।

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