लौकी की खेती से 120 दिन में 45 टन तक उत्पादन सही किस्म और सिंचाई प्रबंधन से किसान बढ़ाएं कई गुना मुनाफा
अगर आप खेती में कम समय में ज्यादा मुनाफा कमाने का तरीका खोज रहे हैं तो लौकी की खेती आपके लिए एक शानदार अवसर बन सकती है। आज के समय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इसी कारण बाजार में लौकी की मांग लगातार बनी रहती है। बेहतर पाचन शुगर नियंत्रण और कब्ज से राहत जैसे फायदे इसे हर घर की जरूरत बना देते हैं। सही तकनीक अपनाकर किसान 120 दिन की फसल अवधि में प्रति हेक्टेयर 40 से 45 टन तक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
क्यों फायदेमंद है लौकी की खेती
लौकी एक वार्षिक चढ़ाई वाली बेल है जो तेजी से बढ़ती है और सफेद आकर्षक फूल देती है। इसकी खेती साल के अलग अलग मौसम में की जा सकती है। पारंपरिक फसलों की तुलना में इसमें लागत कम और बाजार भाव स्थिर रहता है। इसी वजह से यह किसानों के लिए सुरक्षित और लाभकारी विकल्प बन रही है। सही देखभाल के साथ किसान 60 से 70 दिनों में तुड़ाई शुरू कर सकते हैं जिससे जल्दी आमदनी मिलती है।
उन्नत किस्मों का सही चयन है सफलता की कुंजी
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट Dinesh Jakhar के अनुसार लौकी की खेती में सफलता के लिए उन्नत किस्मों का चयन बेहद जरूरी है। गोल लौकी के लिए Pusa Summer Prolific Round Pusa Manjari और Punjab Round उपयुक्त मानी जाती हैं। लंबी लौकी के लिए Pusa Summer Prolific Long बेहतर विकल्प है। एक एकड़ के लिए 500 से 600 ग्राम बीज पर्याप्त होता है जबकि एक हेक्टेयर के लिए लगभग 3 से 4 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।
बीज उपचार और बुवाई का सही समय
मृदा जनित फफूंद से बचाव के लिए बीजों को 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बाविस्टिन 02 प्रतिशत से उपचारित करना जरूरी है। बुवाई के लिए फरवरी मार्च जून जुलाई और नवंबर दिसंबर के महीने उपयुक्त माने जाते हैं। दिसंबर का महीना विशेष रूप से अच्छा समय माना जाता है। बीज उपचार से अंकुरण बेहतर होता है और रोगों का खतरा कम होता है।
खाद और उर्वरक प्रबंधन से बढ़ेगा उत्पादन
खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ 20 से 25 टन गोबर की खाद मिलाना चाहिए। इसके अलावा 28 किलोग्राम नाइट्रोजन यानी लगभग 60 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ देना फायदेमंद रहता है। संतुलित पोषण से पौधों की बढ़वार मजबूत होती है और फल संख्या में वृद्धि होती है। उचित पोषण प्रबंधन से ही 45 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन संभव हो पाता है।
सिंचाई और खरपतवार नियंत्रण का रखें ध्यान
बुवाई के तुरंत बाद पहली सिंचाई अनिवार्य है। शुरुआती विकास के दौरान 3 से 4 दिन के अंतराल पर पानी देना चाहिए। फूल और फल बनने के समय एक दिन छोड़कर सिंचाई करना बेहतर रहता है। पूरी फसल अवधि में औसतन 9 सिंचाई पर्याप्त होती है। गर्मी में 6 से 7 बार पानी की जरूरत पड़ती है जबकि बरसात में जल निकासी का विशेष ध्यान रखना चाहिए। खरपतवार नियंत्रण के लिए 2 से 3 बार निराई गुड़ाई करें और बरसात में पौधों पर मिट्टी चढ़ाएं ताकि जड़ों को मजबूती मिले।
शुद्ध बीज उत्पादन के लिए जरूरी सावधानियां
लौकी की शुद्धता बनाए रखने के लिए इसे अन्य किस्मों से कम से कम 800 मीटर की दूरी पर लगाएं। किसी भी रोगग्रस्त पौधे को तुरंत खेत से निकाल दें। बीज उत्पादन के लिए फलों को पूरी तरह पकने दें और फिर सुखाकर बीज निकालें। टाइप टू बीज उत्पादन के लिए कम से कम तीन बार खेत का निरीक्षण जरूरी है।
कम समय में ज्यादा कमाई का मौका
लौकी की कुल फसल अवधि लगभग 120 दिन की होती है। सही तकनीक अपनाने पर किसान 40 से 45 टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन लेकर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। बाजार में सालभर मांग होने के कारण इसकी बिक्री में भी परेशानी नहीं आती। यह फसल कम लागत में अधिक लाभ देने वाली साबित हो रही है।
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युवा और ऊर्जावान पत्रकार चयन प्रजापत 'रॉयल बुलेटिन' के लिए मध्य प्रदेश के इंदौर से रिपोर्टिंग कर रहे हैं। आपकी मुख्य विशेषज्ञता खेल (Sports), कृषि (Farming) और ऑटोमोबाइल (Automobile) सेक्टर में है। चयन प्रजापत इन विषयों की तकनीकी समझ के साथ-साथ ज़मीनी हकीकत को अपनी खबरों में पिरोने के लिए जाने जाते हैं। इंदौर और मालवा क्षेत्र की खबरों के साथ-साथ ऑटोमोबाइल और खेल जगत की विशेष कवरेज के लिए आप रॉयल बुलेटिन के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

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