पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में बंधक जवानों को पहचानने से किया इनकार, खतरे में सात की जान

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नई दिल्ली। पाकिस्तान ने एक बार फिर अपने जवानों को धोखा दिया है। पाकिस्तानी सेना ने कथित तौर पर मुसीबत में फंसे अपने जवानों के अस्तित्व को ही नकार दिया। दरअसल 14 फरवरी को बलूच लिबरेशन आर्मी ने तस्वीरें और वीडियो जारी करके दावा किया कि उसने पाकिस्तान सेना के सात जवानों को पकड़ लिया है। संगठन ने साफ कहा कि उनके साथियों को छोड़ो, वरना 21 फरवरी के बाद इन सैनिकों को मार दिया जाएगा। यानी पाकिस्तान को सीधा सीधा अल्टीमेटम। ये वीडियो सामने आते ही पाकिस्तान सेना की दसवीं कोर और इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट्स एक्टिव हो गए।

 

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उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि वीडियो फर्जी है, डिजिटल छेड़छाड़ की गई है और जो लोग दिख रहे हैं वे पाकिस्तानी सैनिक नहीं हैं। देखते ही देखते ऑनलाइन नैरेटिव सेट करने की कोशिश शुरू हो गई और इसे ‘इन्फॉर्मेशन वॉर’ बताया गया। इस बीच पाकिस्तान के एक रोते सिपाही का वीडियो सामने आया जो आर्मी से जुड़े अपने दस्तावेज दिखा रहा है। उच्च पदस्थ रक्षा सूत्रों ने बताया कि मामला तब और गंभीर हो गया जब एक नया वीडियो सामने आया। उसमें सातों लोग साथ बैठे दिखे और अपने-अपने आर्मी सर्विस कार्ड कैमरे पर दिखाए। मोहम्मद शाहराम नामक एक सिपाही तो साफ तौर पर भावुक नजर आया। उसने अपना सैन्य पहचान पत्र और नेशनल डेटाबेस एंड रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी का राष्ट्रीय पहचान पत्र दिखाते हुए पूछा, “अगर ये असली नहीं हैं तो इन्हें जारी किसने किया?" उन्होंने बताया कि वह अपने घर के सबसे बड़े बेटे हैं। उनके पिता दिव्यांग हैं और परिवार पूरी तरह उन पर निर्भर है. उनका दर्द साफ दिख रहा था। उन्होंने पाकिस्तानी सेना से सीधा सवाल किया, “अगर हम सेना से नहीं हैं, तो भर्ती किसने की?" 15 फरवरी को बलूच लिबरेशन आर्मी ने तस्वीरें और वीडियो जारी कर दावा किया कि उसने पाकिस्तान सेना के सात जवानों को हिरासत में लिया है।

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वीडियो सामने आते ही पाकिस्तान सेना का आधिकारिक नैरेटिव यह था कि वीडियो में दिख रहे लोग पाकिस्तानी सैनिक नहीं हैं और फुटेज डिजिटल रूप से छेड़छाड़ कर तैयार किया गया है। यहां बलूच लिबरेशन आर्मी के दावों को मनगढ़ंत प्रचार बताया गया। इस बीच बलूच लिबरेशन आर्मी ने दो अन्य व्यक्तियों के वीडियो भी साझा किए। इनकी पहचान दीदार उल्लाह और उस्मान के रूप में कराई गई। दोनों ने खुद को पाकिस्तान सेना का सेवारत जवान बताया और अपने दस्तावेज दिखाए। इस सब के बीच 21 फरवरी की समय-सीमा करीब आती जा रही है। संगठन ने सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी है कि यदि इस्लामाबाद बातचीत शुरू नहीं करता है और इन सैनिकों को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं करता है, तो परिणाम गंभीर होंगे। रक्षा सूत्रों का कहना है कि इस बीच पाकिस्तान की ओर से स्पष्ट और औपचारिक बयान सामने नहीं आया है, जिससे अटकलों और चर्चाओं को और बल मिला है।

 

सोशल मीडिया पर यह बहस तेज है कि क्या यह सचमुच बंधक संकट है या फिर सूचना युद्ध का हिस्सा। यह घटनाक्रम 1999 के कारगिल संघर्ष की याद दिला रहा है। उस समय भी शुरुआती दौर मेंपाकिस्तानियों ने यहां अपने नियमित सैनिकों की मौजूदगी से इनकार किया था। बाद में जब युद्धक्षेत्र से प्रमाण और शव बरामद हुए, तो आधिकारिक दावों पर सवाल खड़े हुए और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई। मौजूदा स्थिति में भी कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पहले नैरेटिव को चुनौती देना और सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करने की कोशिश करना एक रणनीतिक कदम हो सकता है। अब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के नेतृत्व वाली मौजूदा व्यवस्था भी विश्वसनीयता की ऐसी ही परीक्षा का सामना कर रही है। मौजूदा हालात एक जानी-पहचानी रणनीति की ओर इशारा करते दिखते हैं।

 

पहले नैरेटिव को चुनौती दो, फिर जनमत को मैनेज करो, और अंत में संस्थागत जवाबदेही को टाल दो। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे बड़ा प्रश्न उन सात लोगों की पहचान और सुरक्षा का है। यदि वे वाकई सैनिक हैं, तो सचमुच यह दयनीय स्थिति है कि उन्हें अपने ही संस्थान से मान्यता पाने के लिए वीडियो के जरिए अपील करनी पड़ रही है और यदि वे सैनिक नहीं हैं, तो उनके पास सैन्य और राष्ट्रीय पहचान के दस्तावेज कैसे हैं?

 

गौरतलब है कि बलूचिस्तान लंबे समय से अस्थिरता और विद्रोह की गतिविधियों से प्रभावित क्षेत्र रहा है। वहां तैनात सुरक्षा बलों को लगातार जोखिम का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह मामला केवल एक बंधक का संकट नहीं, बल्कि पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और सूचना प्रबंधन की परीक्षा बन गया है। अब सबकी निगाह 21 फरवरी पर टिकी है। रक्षा विशेषज्ञों की नजर इस पर है कि क्या बातचीत का रास्ता खुलेगा, क्या आधिकारिक बयान आएगा या फिर स्थिति और तनावपूर्ण हो जाएगी। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान के इस रवैये ने सैन्य पारदर्शिता और वर्दीधारियों की सुरक्षा पर गंभीर बहस छेड़ दी है। 

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लेखक के बारे में

अर्चना सिंह | Online News Editor Picture

मूल रूप से गोरखपुर की रहने वाली अर्चना सिंह वर्तमान में 'रॉयल बुलेटिन' में ऑनलाइन न्यूज एडिटर के रूप में कार्य कर रही हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों से अधिक का गहरा अनुभव है। नोएडा के प्रतिष्ठित 'जागरण इंस्टीट्यूट' से इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में मास्टर्स की डिग्री प्राप्त अर्चना सिंह ने अपने करियर की शुरुआत 2013 में पुलिस पत्रिका 'पीसमेकर' से की थी। इसके उपरांत उन्होंने 'लाइव इंडिया टीवी' और 'देशबंधु' जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दीं।

वर्ष 2017 से 'रॉयल बुलेटिन' परिवार का अभिन्न अंग रहते हुए, वे राजनीति, अपराध और उत्तर प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर प्रखरता से लिख रही हैं। गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े होने के कारण पूर्वांचल और पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर उनकी विशेष पकड़ है।

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