श्रेष्ठ कर्मों से स्वर्ग की प्राप्ति और कर्मों का महत्व
सभी मनुष्य स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करते हैं। लेकिन केवल वही व्यक्ति स्वर्ग की प्राप्ति कर सकता है, जिनके कर्म श्रेष्ठ और पुण्यपूर्ण हों। बुरे कर्म करने वालों को नरक में दुख भोगना पड़ता है। यह सत्य है कि परमात्मा की न्याय व्यवस्था पूरी तरह कर्म आधारित है।
स्वर्ग का अर्थ केवल सुख और आनंद प्राप्त करना ही नहीं है, बल्कि यह आवागमन से मुक्ति का मार्ग भी है। स्वर्ग में प्राप्त आनंद की भी एक अवधि होती है। श्रेष्ठ कर्मों के आधार पर यह अवधि हजारों वर्षों की हो सकती है, कभी-कभी यह लाखों या करोड़ों वर्षों तक भी पहुंच सकती है। जब यह अवधि समाप्त हो जाती है, तो व्यक्ति फिर मत्युलोक में आकर नए जीवन के विभिन्न रूपों में जन्म लेता है।
जैसे कोई व्यक्ति गर्मी से बचने के लिए पहाड़ों की यात्रा करता है और अपने पास के साधन समाप्त होने पर घर लौट आता है, उसी प्रकार शुभ कर्मों की पूंजी समाप्त होने पर स्वर्गीय आनंद की अवधि समाप्त हो जाती है और आत्मा को पुनः जन्म लेना पड़ता है।
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्म इस प्रकार करने चाहिए कि स्वर्गीय आनंद का अनुभव अधिकतम समय तक प्राप्त किया जा सके और पुण्य की ऐसी धारा बनाई जा सके, जो अनंतकाल तक लाभदायक हो। कर्मों की श्रेष्ठता ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि और स्थायी आनंद का मार्ग है।
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लेखक के बारे में
"गन्ना विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी प्रण पाल सिंह राणा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। प्रशासनिक सेवाओं में एक लंबा और सफल कार्यकाल बिताने के साथ-साथ, पिछले 50 वर्षों से ज्योतिष, वेद और अध्यात्म के प्रति उनकी गहरी रुचि ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दी है।
श्री राणा पिछले 30 वर्षों से 'रॉयल बुलेटिन' के माध्यम से प्रतिदिन 'अनमोल वचन' स्तंभ लिख रहे हैं, जो पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। उनके लिखे विचार न केवल ज्ञानवर्धक होते हैं, बल्कि पाठकों को जीवन की चुनौतियों के बीच सकारात्मक दिशा और मानसिक शांति भी प्रदान करते हैं। प्राचीन वैदिक ज्ञान को आधुनिक जीवन से जोड़ने की उनकी कला को पाठकों द्वारा वर्षों से सराहा और पसंद किया जा रहा है।"

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