सभी धर्म देते हैं सत्य पर चलने की प्रेरणा !

 
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अमुक धर्म अच्छा है, श्रेष्ठ है और अमुक बुरा है। इस विवाद में धर्म हितैषी नहीं पड़ते। अपने काम की योग्य वस्तु वे हर धर्म से ग्रहण कर लेते हैं तथा अनुपयोगी की उपेक्षा कर देते हैं। अच्छा देखने का स्वभाव  बनाओ, त्रुटियों की अथवा जिन्हें आपकी आत्मा स्वीकार न करें, उसकी उपेक्षा कर दो। कुछ न कुछ अच्छा हर धर्म, हर वस्तु और हर स्थान पर मिलेगा। उसे पाने के लिए नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करें, किन्तु उसकी आलोचना समालोचना के चक्र में न पड़कर लोक हितकारी विषयों को ग्रहण कर लें। सभी धर्म हमें सत्य पर चलने की शिक्षा देते हैं। धर्म का मूल भी यही है, चोरी, बेईमानी, विश्वासघात, दूसरों की हकतल्फी की शिक्षा किसी धर्म में नहीं मिलेगी। जैसे सत्य को ही ले, उस पर सभी एकमत हैं, उसी को सभी ग्रहण कर ले तो कल्याण हो जायेगा। इसलिए हठधर्मिता छोड़कर किसी विवाद में न पड़कर जो जीवन पद्धति अनुपयुक्त लगती हो, उसे त्याग कर जो आत्मोन्नति के लिए उपयुक्त लगे, उसे अपना लेना ही बुद्धिमानी है।

 

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