परमात्मा तुम्हारे ही भीतर है !

 
न
न दिखने का अर्थ केवल न दिखना है, गुम हो जाना नहीं। जैसे तुम्हारा भगवान तुमसे गुम नहीं हुआ, तुम परमात्मा से बिल्कुल भी नहीं बिछड़े हो, तुम परमात्मा से बिल्कुल भी दूर नहीं हो। वह यहीं है, अभी भी है, तुम्हारे ही पास है, तुम्हारे ही भीतर है। तुम उसे देख नहीं पा रहे हो, अनुभव नहीं कर पा रहे हो, इसीलिए तो वह बिछड़ा हुआ लगता है। ईश्वर तो सर्व व्यापक है, शुद्ध एवं पवित्र है। यह समझते हुए जो दुष्कर्मों से बचता है, वही सच्चा आस्तिक है। आस्तिकता से सत्य की सिद्धि होती है और सत्य से धर्म की और धर्म से प्रेम की। प्रेम पैदा करो, प्रेम में ही जियो, प्रेम ईर्ष्या-द्वेष और पूर्वाग्रह से रहित है, प्रेम और परमात्मा दो नहीं एक हैं। जब तक प्रेम की वीणा नहीं बजेगी। तब तक परमात्मा को पहचानना असम्भव है। वह तुमसे बिछुड़ा ही रहेगा। तर्क से परमात्मा नहीं मिलता, बुद्धि से प्रभु के दर्शन नहीं होते, प्रवचनों से भी परमात्मा को पाना दुर्लभ है। खाली श्रवण से भी उसकी प्राप्ति नहीं होती। वह जब भी मिलेगा प्रेम से ही मिलेगा।

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