परमेश्वर की प्राप्ति ही सच्चा आनंद !

 
मज्मना
लौकिक आनंद सिद्धिदायक नहीं, इससे जीवन का उद्देश्य भी पूरा नहीं होता। विचार, बुद्धि, तर्क, विवेक की जो साधारण तथा असामान्य शक्तियां मनुष्य को प्राप्त होती हैं, वे केवल भौतिक सुखों के अर्जन में ही लगी रहे तो इससे मिलेगा क्या। इनमें ही स्वयं को लिप्त किये रखना कहां की बुद्धिमानी है। जब तक यह नहीं जान पाते कि हम कौन हैं, कहां से आये हैं, कहां जाना है, क्या लेने आये थे और लेकर क्या जा रहे हैं, तब तक हमने इस जीवन को मानो नष्ट ही कर दिया। सोचो क्या हमें आनंद की प्राप्ति हो गई। हम तो लौकिक सुख को ही पूर्ण आनंद माने बैठे हैं, किन्तु पूर्ण आनंद तो वह है, जहां विकृत्ति न हो, किसी प्रकार की आशंका, अभाव अथवा परेशानी न उठानी पड़ती हो। लौकिक आनंद में तो यही सब कुछ है। स्वाभाविक जीवन में जो आनंद मिल रहा है, वही हमारी नियति बन गया है, परन्तु सोचना होगा कि क्या वही सच्चा आनंद है। वास्तव में भौतिक पदार्थों से मिलने वाला सुख तो सच्चा आनंद हो ही नहीं सकता। सच्चे आनंद की अनुभूति तो परमेश्वर की प्राप्ति में है। उस मार्ग पर जाने में कुछ कठिनाईयां तो हैं, परन्तु उस परमानंद की प्राप्ति के पश्चात वर्तमान की निर्जीव उपलब्धियां तथा भौतिक सुख के साधन जिनमें हम आनंद की खोज कर रहे हैं, व्यर्थ लगने लगेंगे।

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