अकेले ही भुगतना होगा कर्म का फल 

 
अनमोल वचन
प्रत्येक जीवात्मा  एक स्वतंत्र सत्ता है। जीव कर्म करेगा उसका फल भी उसे ही अकेले को भोगना पड़ेगा। बहुधा व्यक्ति परिवार पोषण के लिए अपनी आय में वृद्धि करने के लिए नैतिक-अनैतिक का भेद करना छोड़ देते हैं, जबकि उसे केवल निष्ठापूर्वक परिश्रम और सत्पुरूषार्थ की कमाई पर ही संतोष करना चाहिए। यदि वह कोई पाप करेगा, चोरी, डकैती अथवा किसी दूसरे की कमाई को अनाधिकार से प्राप्त करेगा, तो उसका दंड भी केवल वही भोगेगा। जिस परिवार या सम्बन्धियों के लिए मोह तथा आसक्ति के कारण वह पाप कर रहा है, उसके दंड में उनकी किसी प्रकार भी भागीदारी नहीं होगी। इसलिए परिवार के साथ बेशक रहो, परन्तु मोह और असक्ति से दूर रहो। मन में यह दृढ़ संकल्प करके सत्पथ पर आगे बढो कि मेरा यह दुर्लभ शरीर न सभी बच्चों के लिए है न दुकान, मकान और अन्य तुच्छ वस्तुओं के संग्रह के लिए है। तुम्हें केवल अपने उत्तरदायित्व पूरे करने हैं और वह भी ईमानदारी के साथ। परिजनों को प्रसन्न रखने के लिए कुमार्ग का सहारा बिल्कुल न लें। इस शरीर से तुम्हें आत्म ज्ञान प्राप्त करना है, बाहर के रिश्तों-नातों को, सांसारिक व्यवहार को उतना ही महत्व दो, जहां तक साधना के मार्ग में विघ्न  न आये, परन्तु दूसरों की सेवा और सहायता जो बन पडे अवश्य करो। इसे भी साधना का ही एक साधन मानना चाहिए।

 

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