ईर्ष्या एक रोग है !

 
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हम किसी पर कीचड़ फेंकना चाहते हैं तो पहले हमें कीचड़ उठाना होगा। पहले कीचड़ में अपने हाथों को गंदा करना होगा। इसी प्रकार ईर्ष्या  में दूसरों को हानि पहुंचाने से पूर्व हमें स्वयं अपने हृदय को जलाना होगा। जैसे दूसरों पर कीचड़ फेंकते समय अपने ऊपर भी कीचड़ पड़ जाता है, इसी प्रकार ईर्ष्यावश दूसरों पर क्रोध करते समय मन जिह्वा तथा मुख मलिन होते हैं। सच यह है कि ईर्ष्या का फल ईर्ष्या करने वाले को ही भोगना पड़ता है। ईर्ष्या मृत्यु का ही रूप है। जिस प्रकार मृत्यु मन को मूर्छित कर देती है, सगे-सम्बन्धियों की पहचान का ज्ञान नहीं रहने देती, वैसे ही ईर्ष्या  भी मन को मूर्छित कर देती है। जो ईर्ष्या रूपी रोग में फंसे रहते हैं वे अपने जीवन और आयु का हृास करते रहते हैं। उनकी विचारशक्ति नष्ट हो जाती है। मन का कार्य है विचार करना, विवेक द्वारा हिताहित और भले-बुरे की परख करना, आत्म बोध करना। जिस मन में ईर्ष्या में आसन लगा लिया है, उसे और क्या सूझेगा। ईर्ष्या  के कारण उस विवेक बुद्धि का नाश हो जायेगा, जिसके कारण मनुष्य, मनुष्य कहलाता है। जब मनुष्य तत्व का आधार ही लुप्त हो गया, तब उसके मरने में संदेह ही क्या रहा।

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