निर्मल मन ही भय मुक्त रह सकता है !

 
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जब तक भीतर से भयमुक्त रहोगे, बाहर की कोई भी परिस्थिति तुम्हें भयभीत नहीं कर पायेगी। बाहर की परिस्थितियों में इतना दम कहां जो सर्व नियंता प्रभु के भक्त को डरा सके अथवा विचलित कर सके। भीतर यदि भय बना रहेगा, तो प्रभु भक्ति का द्वार भी आपके लिए बंद ही रहेगा। निर्मल मन ही भय मुक्त रह सकता है। जब तक पात्र मैला है, प्रभु कृपा के प्रसाद से वंचित ही रहोगे। अपने को हीन समझना और परिस्थितियों के सामने झुक जाना आत्म हनन के समान है। तुम्हारे भीतर ईश्वरीय शक्ति है, यह शक्ति देकर परमात्मा ने तुम्हें अनन्त सामर्थ्य का स्वामी बनाया है, जिसके बल पर तुम सब कुछ करने में समर्थ हो। परिस्थितियों को बदलना भी तुम्हारे हाथ में है। आवश्यकता केवल अपने अनन्त सामर्थ्य को पहचानने की है, किन्तु परिस्थितियां कैसी भी आये तुम्हें सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होना। सत्य मार्ग को अपनाने में विघ्न बाधाएं भी आयेंगी, निंदा और अपमान भी सहने पडेंगे, किन्तु समझना प्रभु परीक्षा ले रहे हैं। इस परीक्षा में किसी भी दशा में असफल नहीं होना। वही सत्य ही है, जो तुम्हें सफलता के मार्ग पर ले जायेगा।

 

 

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