शुद्धता मात्र शरीर की नहीं....!

 
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बहुधा हम शुुद्धि का अर्थ शरीर की शुद्धि से लगाते हैं, परन्तु शुद्धता मात्र शरीर की नहीं शरीर से भी महत्वपूर्ण है मन और आत्मा की शुद्धि। इसे समझने के लिये यह कथानक बहुत प्रासंगिक होगा। 'एक युवक संसार से विरक्त हो फिलिस्तीन के सन्त मरटिनियस के पास आया और बोला 'भगवन मैं आपकी सेवा में आ गया हूँ, कृपया मुझे आश्रय दे सन्त बोले जाओ पहले शुुद्ध होकर आओ। युवक स्नान करने गया संत ने एक भंगिन को बुलाकर युवक आने पर इस प्रकार झाड़ू लगाने को कहा, जिससे धूल युवक के शरीर पर उड़े। भंगिन के वैसा ही करने पर युवक उसे मारने को दौड़ा, तो वह भाग गई। सन्त ने युवक को फिर से शुद्ध होकर आने को कहा। युवक के जाने पर संत ने भंगिन को छूने के लिये कहा। युवक स्नान करके आया तो भंगिन ने झाड़ते झाड़ते उसे छू लिया। युवक गुस्से में मारने तो नहीं दौड़ा, पर उसे खूब गालियां दी। संत ने फिर शुद्ध होकर आने को कहा, युवक जब नहाकर आया तो भंगिन ने संत के निर्देशानुसार उस पर कूड़े की पूरी टोकरी उलट दी, किन्तु इस बार युवक बिल्कुल शांत रहा, बल्कि वह भंगिन को प्रणाम करके बोला 'देवी तुम मेरी गुरू हो, यह तुम्हारी कृपा ही थी कि मुझे अहंकार और क्रोध का भान हो गया और मैं उन्हें अपने वश में कर सका। तब संत युवक से बोले अब स्नान करके आओ, तब तुम पूर्ण रूप से शुद्ध हो जाओगे, अब तुम मेरे साथ रह सकते हो।

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