जीवन को सहजता से ले !

 
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जीवन को भारस्वरूप मानकर चलोगे तो वह इतना भारी प्रतीत होगा कि उसका भार उठाये नहीं उठेगा, यदि दृष्टिकोण सरल रखा जाये तो हंसते-खेलते दिन व्यतीत हो जायेंगे, जो व्यक्ति छोटी सी बात को बहुत बड़ी समस्या मान बैठते हैं, उन्हें भय और चिंता की विभीषिका की काली घटाएं अपने चारों और उमड़ती प्रतीत होती है, परन्तु जो सारे संसार को क्रीड़ा स्थल मानते हैं, उनके लिए यह न कोई चिंता की बात है और न ही परेशानी की। यदि छोटी-छोटी बातों के लिए स्वयं को चिंताओं में डुबोयेंगे तो हानि अपनी ही होगी, क्योंकि चिंता हमारा कुछ बना तो नहीं सकती, बिगाड़ बहुत कुछ सकती है। चिंता दीमक की भांति अंदर ही अंदर जीव को खाती रहती है। चिंता रूपी नागिन ज्ञान और विश्वास के अमृत का नाश करके जीवन के अंदर अज्ञानता और अविश्वास का जहर भर देती है। परमात्मा में पूर्ण विश्वास रखते हुए चिंताओं को त्यागकर साहस, निडरता और दृढ़ता से स्वार्थ (अपने निजी कार्य) और परमार्थ दोनों में आगे बढ़ते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए। इसी में उल्लासमय जीवन का रहस्य छिपा है।

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