ईर्ष्या की अग्नि !

 
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दूसरों को उन्नति करते देखकर, स्वयं वैसा करने में अपने को असमर्थ पाकर हृदय में जो जलन होती है, उसे ईर्ष्या कहा जाता है, जिसके मन में ईर्ष्या पैदा हो जाती है, उस व्यक्ति के मन में विद्वेष की अग्रि प्रज्जवलित हो जाती है। उस अग्रि से ईर्ष्यालु ही जलता है। मन का यह स्वाभाव है कि उसमें एक समय एक ही विचार आता है। ईर्ष्या की जलन के समय ईर्ष्या का ही भाव रहता है। इस कारण उस व्यक्ति में सद्भावों का उदय नहीं हो पाता। भौतिक अग्रि में भौतिक पदार्थ जलते हैं, किन्तु ईर्ष्या  की अग्रि में पड़ा मन मानो राख हो जाता है, क्योंकि ईर्ष्या  साधारण अग्रि नहीं, सब कुछ भस्म करने वाला दावानल है। यह उसी को भस्म करती है, जिसमें यह पैदा होती है। इसलिए इस अग्रि से स्वयं को बचाना चाहिए, जिसका सर्वोत्तम उपाय है सद्विचार। सदृविचार ईर्ष्या की अग्रि को समाप्त करने के लिए वही कार्य करते हैं, जो जल भौतिक अग्रि को शांत करने के लिए करता है।

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