किसी रोते के आंसू पोंछ दे....!

 
न
कदाचित यह सीख महान आयुर्वेदाचार्य महर्षि चरक की है 'मित भुक हित भुक ऋत भुक अर्थात कम खाओ, जो शरीर के लिये हितकारी हो वह खाओ और जो ऋतु के अनुकूल है वह खाओ, तभी लम्बा और स्वस्थ जीवन जी पाओगे। कम खाने से तात्पर्य भूखे रहना नहीं, क्योंकि उससे कार्य क्षमता का ह्रास होगा अर्थात कार्य क्षमता कम हो जायेगी, परन्तु उतना खाओ जिससे क्षुधा शांत हो जाये। बिना भूख के खाना तो और भी बुरा है। यदि किसी ने हठपूर्वक थाली में अधिक डाल भी दिया है अथवा भूलवश अधिक ले लिया गया है तो भी भूख से अधिक एक ग्रास भी न खाये, यह सोचकर कि यह खराब होगा। खराब तो उसे होना ही है, क्योंकि जो बन गया, उसे बिगडऩा ही है, परन्तु अधिक खाकर अपने को क्यों बिगाड़ते हो। बचा हुआ भोजन किसी भूखे प्राणी के काम आयेगा, किसी भूखे का भला होगा। इसी प्रकार धन की फिजूलखर्ची भी ठीक नहीं। यदि आपके पास अधिक है, तो अपनी आवश्यकताएँ पूरी कर किसी अभावग्रस्त की सहायता कर दें, किसी रोते के आंसू पोंछ दे, मन को शान्ति भी मिलेगी और पाप से भी बच जाओगे।

From around the web