श्रेष्ठ मानव बनो

 
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वेद का ऋषि कहता है 'मर्नुभव जनमा दैव्यं जन्म... अर्थात श्रेष्ठ मानव बनो, आपकी सन्तानें भी दिव्य गुणों से युक्त हो। भारतीय संस्कृति 'वसुधैव कुटम्बकम' अर्थात पूरी वसुधा को ही अपना परिवार के सिद्धांत में विश्वास करती हैं। सभी अपने परिवार के सदस्य हैं, कोई गैर नहीं। किसी से बैर नहीं, भले ही उसकी पूजा पद्धति कोई भी हो। हमारी परम्परा सबको स्वयं में और स्वयं को सबमें देखने की रही हैं। यही सर्वात्म भाव हैं। यदि मानव प्रत्येक विभक्ति से दूर रहे, किसी को भी पराया न समझे, सबसे यथोचित व्यवहार करे तो वह श्रेष्ठ मानव बन सकता है। प्रत्येक आत्म तत्व एक दूसरे का सहोदर है, क्योंकि हम सभी परमात्मा की सन्तानें हैं। प्रत्येक प्राणी हमारा अपना है। उसके प्रति भी हमारा वही दायित्व है, जो दायित्व अपने प्रति है। जीवन अनमोल है। इसे ठीक प्रकार से जीयें, सभी से प्यार करते हुये। हम किसी को अपना शत्रु न माने सिवाय अपने अवगुणों के क्योंकि हमारे वास्तविक शत्रु हमारे अपने भीतर के अवगुण ही हैं।

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