कल्याणकारी कर्म करने वाला

 
न
कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किये नहीं रह सकता। जब करना ही है तो ऐसे कर्म किये जायें जो कल्याणकारी हो, अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी। निश्चित भाव से व्यक्ति को अच्छे कर्मों का आश्रय ही लेना चाहिए। कल्याणकारी कर्म करने वाला कभी दुर्गती को प्राप्त नहीं होता। ऐसे व्यक्ति निश्चित ही प्रशंसा के पात्र होते है। सभी के लिए यह आवश्यक है कि वे कल्याणकारी कर्मों पर ही विचार करें, मनन करे, उन्हें करने का संकल्प लें, दृढ़ता के साथ लें। देहाभिमान और अहंकार छोड़कर प्रभु की इच्छा प्रेरणा, योजना एवं शक्ति का आश्रय लें। कल्याणकारी कर्म चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, नष्ट नहीं होता, उसे करने वाले सदा सद्गति को प्राप्त होते हैं। जो महापुरूष कहलाये, जिनकी यश और कीर्ति फैली, जिनका नाम सदैव आदर और श्रद्धा से लिया जाता है, उनकी महानता का आधार उनके द्वारा किये गये कल्याणकारी कर्म ही तो हैं, जो उनकी उदात्त भावनाओं एवं विचारों की उपज थे। उन्होंने अपने हितों का बलिदान कर समष्टि के लिए स्वयं को आहुत किया और समाज के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया।

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