परम तत्व से आत्मा को जोड़ो 

 
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अनित्य है यह शरीर और नित्य है यह आत्मा। मिटने वाला तत्व है यह शरीर और जो अजर-अमर शाश्वत है वह परमात्मा है और हमारी आत्मा है, जो मिटने वाली नश्वर वस्तुएं हैं, उनकी चिंता करना निरर्थक है। ये आऐंगी, जायेंगी, मिलेंगे-बिछुडेंगे। संसार है ही संयोग और वियोग का स्वरूप। जो मिलकर न बिछुडे, पाकर जिसे न खो दें हम, जो सदा हमारे पास रहेगा वह परम तत्व तो ब्रह्म परमेश्वर है। उसी से स्वयं को अपनी आत्मा को जोडऩे का प्रयास रक्खो। इन मिटने वाले पदार्थों से जोड़ोगे तो रोज ही दुखी रहोगे, क्योंकि ये पदार्थ कभी मिलेंगे, तो कभी बिछुडेंगे। इसलिये उस परम तत्व को ही पाने का प्रयास करो। जिस जिसने आँखे बंद कर उस परम शक्ति को भीतर खोजना चाहा, उस उसको परमात्मा ने अपना आपा प्रकट किया। भीतर जाने की प्रेरणा भी वही देता है, परन्तु उसके लिये तैयार तो स्वयं ही होना पड़ता है, तभी उसकी कृपा भी होती है। 'शक्ति तो एक ही है हर प्राणी में, हर स्थान में वही है। देश बदल जाने से, चमड़ी का रंग बदल जाने से, आपके भीतर परमात्मा बदल नहीं जाता, परन्तु आपकी धारणा, आपको कल्पना के अनुरूप ही उसका स्वरूप आपको दिखाई देगा।

 

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