अहंकार को शत्रु माने 

 
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अहंकार को शत्रु मानकर उससे आत्म रक्षा करें। परमात्मा की भक्ति, विवेक, ज्ञान के अनुशीलन से ही सम्भव है। कर्म, योग तथा भक्ति योग एक-दूसरे के विरोधी नहीं पूरक हैं। निष्काम कर्म से जैसे-जैसे अंत:करण शुद्ध होता जाता है, वैसे-वैसे ही चित्त प्रभु भक्ति तथा विवेक ज्ञान की धारणा के योग्य बनता जाता है। शुद्ध सात्विक बुद्धि में ही आत्मदर्शन तथा प्रभु भक्ति का प्रार्दुभाव होगा। आत्मदर्शन से अविद्या जीवत रोग, द्वेष तथा अहंकार नष्ट होते हैं। आत्मस्वरूप का अनुभव होने के उपरान्त जो शास्त्रोक्त पवित्र कर्म किये जाते हैं, उनसे संतोष की प्राप्ति तो होती ही है अभिमान भी कोसो दूर रहता है। इसलिए आत्मदर्शन के लिए आचरण को पवित्र तथा बुद्धि को सात्विक बनाना प्रथम कर्तव्य है। परमेश्वर सत्य चित्त आनन्द है। जिज्ञासु जिसमें सच्चे आनन्द की प्राप्ति की इच्छा है, वह सत्यचित्त से जीने की, सच्चाई से व्यवहार करने की कला को सीखे। सच्चाई से पात्रता के अनुसार सेवा करें। प्रभु का ध्यान भी सच्चे मन से करें। दृढ़ता के साथ संकल्प के साथ उसे पाने के लिए स्वयं सत्य, चित्त आनन्द बनने का प्रयास करें।

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