इन्द्रियों का राजा - मन

 
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मन इन्द्रियों का राजा है। मन की आज्ञा के बिना इन्द्रियां कुछ भी करने में असमर्थ है। मन इन्द्रियों को जैसा आदेश देगा ये तुरन्त उसका पालन करेंगी। मन जब चंचल होता है, तो इन्द्रियां भी चलायमान रहती हैं और जब मन शांत होता है तो ये इन्द्रियां भी शांत रहती हैं। इन्द्रियों को विकृति से रोकने के लिए मन को रोकना होगा, सुनने में उपाय बहुत सरल है, परन्तु उतना ही कठिन भी, जिसके लिए निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। जहां मन इन्द्रियों का राजा है, वहीं कभी-कभी इनका दास भी बन जाता है। उस समय वह इन्द्रियों के अधीन हो जाता है। तब इन्द्रियां मन की नाक में नकेल डालकर इच्छानुसार नाच नाचती हैं। इन्द्रियां मन को क्या बुद्धि को भी चक्कर में डाल देती हैं और जो बुद्धि मन की स्वामिनी है, वह इन्द्रियों के वशीभूत हो जाती हैं। आगे बढ़कर वह शरीर की शासक आत्मा को भी अपने जाल में फंसा लेती हैं। इस माया जाल के कारण नर-नारियां स्वयं को विषयों में ही लगाये रखते हैं और इन्द्रियां हर समय इन सबको अपनी इच्छानुसार चलाती रहती हैं। आश्चर्य यह है कि इन्द्रियों के पंजे में फंसकर स्वामी सेवक बन जाता है फिर सेवक आदेश कैसे देगा। आत्मा की इस दुर्बलता के कारण सब कुछ चौपट हो जाता है। ऐसी विकट स्थिति का सामना न करना पड़े, इसलिए मन को नियंत्रण में रखने का अभ्यास निरन्तर करते रहना आवश्यक है।

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