ज्ञान और आचरण

 
अनमोल वचन
मनीषी तो कई होते हैं, ज्ञानी और बुद्धिमान भी होते हैं, परन्तु वे सब पावन हों, पवित्र हों, उनका आचरण भी उन्हें प्राप्त ज्ञान के अनुकूल हो, यह अनिवार्य नहीं। ज्ञानी का प्रतिभाशाली और बुद्धिमान होना अलग बात है, परन्तु अन्त:करण में पवित्रता रखते हुए ज्ञान के अनुसार आचरण करना दूसरी बात है। ज्ञान तो उन्हीं का सार्थक है, जो अन्त:शोधन द्वारा पवित्रता को प्राप्त हो गये हो। ज्ञानी को ज्ञान तो है कि जीवात्मा को बंधन में डालने वाली चारदीवारी अश्रद्धा, असत्य, क्रोध और लो्रभ की हैं, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि ज्ञान होते हुए भी ज्ञानी अश्रद्धा के सापेक्ष श्रद्धावान बने, असत्य के सापेक्ष केवल सत्याचरण ही करें, क्रोध पर नियंत्रण रखे अन्यथा अनहोनी होनी में बदल सकती है। ज्ञानी को यह भी ज्ञान है कि लोभ सभी पापों का मूल है फिर भी लोभ का आवरण बुद्धि को कुंठित किये रहता है। यदि ज्ञान को आचरण में ढालना है तो असत्य की दीवार सत्य से तोड़ दें, क्रोध की दीवार सहनशीलता तथा धैर्य से तोड़ दें, लोभ की दीवार को दानशीलता से तोड़ दें। जैसे ही ये टूटेगी प्रकाश स्वरूप का तेज प्रकाशित करना आरम्भ कर देगा। आत्म प्रकाश जगमगाने लगेगा। परम आनन्द की अनुभूति होगी और ज्ञानी का ज्ञान शतश: आचरण में परिवर्तित हो जायेगा, तभी सच्चे अर्थों में ज्ञानी कहलाने के अधिकारी होंगे।

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