अनमोल वचन

 
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दलाईलामा कहते हैं ''मैं सरल धर्म में विश्वास करता हूं, मंदिरों की कोई आवश्यकता नहीं, जटिल जीवन शास्त्र की भी जरूरत नहीं, हमारा हृदय ही हमारा मंदिर है और दयालुता जीवन दर्शन है।'' किसी व्यक्ति के स्वयं से साक्षात्कार होने को दो प्रकार से समझे। प्रथम तो इस प्रकार के व्यक्ति स्वयं को समझ नहीं रहे, वे सक्रिय हैं और पर्याप्त कार्य कर रहे हैं, परन्तु स्वयं के बारे में कभी सोचते नहीं अथवा वे अपनी क्षमताओं एवं सीमाओं से अवगत नहीं। इसलिए अपनी धुन में गलत दिशा में घूम रहे हैं, जबकि अपने गुण या दोषों को खोजकर उसी के अनुसार आगे बढऩा चाहिए, क्योंकि हम जो कार्य कर रहे हैं, उससे बेहतर करने की क्षमता हमारे भीतर विद्यमान है। हम केवल सांसारिक चीजों के प्रति आकृष्ट है, निजी हितों के लिए दौड़ रहे हैं। अपने लाभ के लिए उचित-अनुचित कार्य कर रहे हैं। हमें इस घेरे से बाहर आना होगा, स्वयं को जानने का नये सिरे से प्रयास करना होगा। इस प्रकार अपने में सुधार करते हुए हम न केवल अपनी परेशानियों को हल कर सकेंगे, बल्कि सुख और आनन्द का अनुभव कर सकेंगे।

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