अनमोल वचन

 
न
प्रत्येक व्यक्ति की कामना रहती है कि उसकी सन्तान योग्य बने, आज्ञाकारी हो, व्यसनों से दूर रहे, चरित्रवान हो, उदंड तथा अहंकारी न हो, उन्नति करें, समाज में उसका नाम हो, सम्मान हो, किन्तु आजकल अधिकांश अभिभावकों की शिकायत यही रहती है कि संतान उनके कहने में नहीं हैं, उदंड और अनुशासनहीन है, किन्तु वे इस सत्य का विस्मरण कर देते है कि यदि माता-पिता व्यसनी है, चरित्रवान नहीं, अहंकारी है, अपने बड़ों का सम्मान नहीं करते, स्वयं अनुशासनहीन है, मर्यादाओं की कसौटी पर स्वयं खरे नहीं उतरते, तो संतान तो उनकी परम्पराओं का ही तो अनुसरण कर रही है। यदि वे स्वयं उन मर्यादाओं का पालन नहीं करते, जिनकी अपेक्षा उनसे की गई थी तो संतान से ऐसी अपेक्षाएं करना मृग मरीचिका ही होगी। पहले स्वयं तो कसौटी पर खरे उतरो, पहले स्वयं तो उपयुक्त आचरण करो, पहले स्वयं तो अपने सम्मानित बुजुर्गों को सम्मान दो, पहले स्वयं तो अनुशासन का पालन करो, तभी ऐसी अपेक्षाएं करने का अधिकार तुम्हें मिल पायेगा। जीवन की प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जब संतान पिछड़ जायेगी तो सिर धुनते रहना और उनकी असफलता का दोष भी दूसरों के सिर डालते रहना, किन्तु तब पछताने के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं आयेगा।

From around the web