अनमोल वचन

 
न
वेद शिक्षा देते हैं, उपनिषद समझाते हैं, परन्तु हम है कि समझने का प्रयास ही नहीं करते। हम इस शरीर को ही, इस शरीर के लिए रखे गये नाम को ही सब कुछ मान बैठे हैं। चाहते हैं कि हमारे नाम का गुणगान हो। लोग हमारे चित्र लगाकर, मूर्तियां बनाकर उन पर फूल-मालाएं चढ़ाये, जब हम गर्भ में थे, तब हमारा कोई नाम नहीं था। नाम जन्म के बाद रखा गया। एक नाम अच्छा नहीं लगा, दूसरा रख लिया, तीसरा रख लिया। हम यह भी जानते हैं कि यह शरीर नष्ट हो जायेगा, तत्वों में विलीन हो जायेगा, तब उन तत्वों का क्या यह नाम रहेगा, फिर नाम में क्या रखा है। रज और वीर्य के संयोग से निर्मित हुआ यह शरीर कुछ समय पश्चात राख हो जायेगा। हम शरीर से पहले भी थे। हम शरीर के बाद भी रहेंगे। इस शरीर का जो नाम रखा है, उस नाम के बाद भी रहेंगे। नाम और शरीर हम नहीं हैं, जो इस शरीर को ही इसके नाम को ही 'मैं' अर्थात आत्मा मान बैठता है, वह अज्ञानी है, झूठे नाम के लिए अपने अज्ञान के कारण वह झूठे प्रपंच रचता है और पाप का भागी बनता है।

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