अनमोल वचन

 
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ऐसी कौन सी विपत्ति है, जो तुम्हारी प्रसन्नता को नष्ट कर सके। वह ऐसा कौन सा शोक है, जो तुम्हारे सुख में, आनन्द में विघ्र डाल सके। तुम इस विश्व से ऊपर हो, बुद्धि के स्वामी हो, मन के शासक हो, संसार में रहते हुए भी संसार से अलग हो। तुम दृष्टा हो, तुम्हें कोई बांध नहीं सकता। इस अखिल ब्रह्मांड के ग्रह नक्षत्र तुम्हारे भीतर ही उदय-अस्त होते हैं। इस यथार्थ को हर पल याद रखे कि 'मैं निर्लिप्त आत्मा हूं। मेरा जन्म नहीं, मेरी मृत्यु नहीं। मैं अजर-अमर हूं। मैं यह शरीर नहीं बल्कि इस शरीर का दृष्टा हूं। मैंने इस शरीर की रचना होते हुए देखी है, इसकी शिशु अवस्था को देखा, इसका बचपन, युवा, प्रौढ़ और वृद्धावस्था भी देखी है। जब-जब मुझे शरीर प्राप्त हुए उन्हें नष्ट होते भी देखा अर्थात मृत्यु का साक्षात्कार भी किया। मैं ईश्वर में हूं और ईश्वर मुझ में है। मैं सर्वस्व हूं, सर्वज्ञ सर्वगत आत्मा हूं। मैं अपना साक्षी तथा अपना प्रमाण मैं स्वयं ही हूं। मेरा ऐसा चिन्तन रहेगा तो न चिंता होगी न शोक होगा न अति हर्ष होगा न निराशा।

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