अनमोल वचन

 
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मनुष्य में यह कमजोरी है कि वे दूसरों के सामने अन्य की बुराईयां तथा अपनी अच्छाईयों को ही उजागर करते हैं। सच्चाई यह है कि अपना मन बहुधा अपने साथ पक्षपात करता है, अपनी गलती के बावजूद अपने को निर्दोष बताता है। गलतियां हम करते हैं और उनका कारण दूसरों पर थोपने की तरकीब ढूंढते रहते हैं। ऐसे पक्षपाती मन के रहते कोई अपनी बुराई को कैसे समझेगा और जब समझा ही नहीं गया तो सुधरेगा कैसे। स्वयं को सुधारने के लिए आत्मविशलेषण और स्वयं की समीक्षा करें, गलतियों को समझे, अपनी बुरी आदतों से लडे और उन्हें हटाकर ही दम लें। जिसने इतना साहस एकत्रित कर लिया वह धीरे-धीरे सुधार के रास्ते पर चल पडेगा और एक दिन इतना नेक बन जायेगा कि अपनी आत्मा भी प्रशंसा करने लगेगी।  अन्तःकरण में शान्ति तथा संतोष का अनुभव होगा। दूसरों की आंखों में धूल झोंककर स्वयं बुरे होते हुए भी अच्छाई की छाप डाल देना , चतुरता का चिन्ह माना जा सकता है। कुछ समय के लिए अच्छा भी कह सकते हैं, किन्तु आत्मा तो सच्चाई जानती है, वह निश्चित रूप से धिक्कारेगी। आत्मा के समर्थन के बिना हम प्रशंसा के फल नहीं बन सकते। इसलिए जैसी प्रशंसा की अपेक्षा आप दूसरों से करते हैं, जैसा दूसरों से कहलाना चाहते हैं वैसा आचरण भी जरूरी है।

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