अनमोल वचन

 
न
यदि हमें केवल यह विश्वास बन जाये कि परमात्मा है और वह हमें दर्शन अवश्य देंगे, तो हमारे सारे कार्य ही शुभ हो जाये, यज्ञ मन बन जाये, जीवन यज्ञ मय हो जाये, किन्तु यदि संशय हुआ तो खेल समाप्त, क्योंकि सारा संसार ही किसी न किसी विश्वास की डोर से बंधा है, जहां विश्वास हिला मर्यादाओं में हीनता आने लगती है, जिसके कारण कर्मों में भी हीनता का वास हो जाता है। प्रभु के अस्तित्व के प्रति आस्था और विश्वास में दृढता लाने के लिए हमें अपने भीतर के अहंकार का त्याग करना होगा, अहंकार रहित व्यक्ति ही प्रभु के प्रति आस्थावान हो सकता है, जिसमें अहंकार भरा हो उसमें न आस्था उपजेगी और न समर्पण का भाव आयेगा। बिना समर्पण के आस्था का अभाव ही रहेगा। आस्था ही तो वह पवित्र भाव है, जो प्रभु के अस्तित्व का बोध कराता है। अहंकार तथा आस्था दोनों एक-दूसरे के शत्रु हैं, जबकि आस्था तथा समर्पण एक दूसरे के पूरक हैं। जहां अहंकार समाप्त होता है, वहां से आस्था का आरम्भ होता है। वह आस्था ही तो है, जो प्रभु के मार्ग पर जाने की प्रेरणा देती है।

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