प्रभु का स्मरण

 
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तुम अपनी आंखों से नष्ट होते संसार को देख रहे हो, परन्तु मिटते हुए संसार को देख कर भी यह मानने को तैयार नहीं कि मेरा भी संसार एक दिन मिट जायेगा। तुम समझ रहे हो कि दूसरों का ही मिटेगा, मेरा नहीं, क्योंकि तुम्हारा मन चेतता ही नहीं, माया ने तुम्हें अंधा बना दिया है। अंधा देखेगा क्या और उसे दीखेगा क्या, यथार्थ को देखने के लिए तो अपने वह ज्ञान चक्षु खोलने ही होंगे। सच्चाई यह है कि एक दिन तुम भी यह सब छोड़कर चले जाओगे और हाथ लगेगा केवल पश्चाताप, उससे पहले तुम मोह-ममता और माया रूपी बंधन को विवेक रूपी कैंची से काटते रहना। बाहर के मित्रों से सगे सम्बन्धियों से प्यार से मिलना अथवा अपने सांसारिक उत्तरदायित्वों को भी पूरा करना, परन्तु भीतर से समझना न कोई मित्र है न सगा-सम्बधी, क्योंकि ये सब साथ छोड़ जायेंगे। सच्चा सगा और सम्बन्धी तो प्रभु ही है, जो सदा साथ रहेगा और इस शरीर की मृत्यु के पश्चात भी साथ न छोड़ेगा। इसलिए प्रभु का स्मरण प्रत्येक क्षण रहना चाहिए।

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