अनमोल वचन 

 
अनमोल
सर्वे भवन्तु सुखिन, सर्वे सन्तु निरामया अर्थात सब सुखी हों, सब निरोग रहें। जब व्यक्ति सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय के इस नीति वाक्य का अनुसरण करता है, इस नीति को अपनाता है, तो परमात्मा उस पर वरदान की वर्षा करते हैं। वह व्यक्ति ही दीन-दुखी और शोषितों, पीड़ितों के लिए ईश्वर तुल्य हो जाता है। वह स्वयं भी उस परमतत्व को प्राप्त कर लेता है। वह जीते जी जिन स्वर्गीय सुखों की अनुभूति करता है वे देवों को भी दुर्लभ है। ऐसा व्यक्ति जहां जाता है, वहीं स्वर्ग का निर्माण कर लेता है। वह स्वयं देवता है, जहां रहेगा, वहीं स्वर्ग है। वह धर्म की व्याख्या भी पूजा पद्धति तथा प्रतीकों के आधार पर नहीं करता। अपनी सामर्थ्य के अनुसार पक्षपात रहित रहकर दूसरों के काम आना, अपने कार्यों से दूसरों को सुख पहुंचाने को ही धर्म मानता है। इसके विपरीत जिनका अध:पतन हो गया है, उनका जीवन ही नरक के समान है, पतित जीवन जीने वाले, पतित दृष्टिकोण अपनाने वाले, पतित कर्म करने वाले अपने समग्र अध:पतन के कारण, सहज ही नरक जाते हैं। नीति और सदाचरण की मर्यादाओं का उल्लंघन, कर्तव्य और धर्म की उपेक्षा, दूसरों के प्रति निष्ठुरता और निर्दयता का व्यवहार, मन की कुटिलता जिसने अपना ली, उसे नरक पहुंचने में कोई रूकावट नहीं आयेगी।

From around the web