सुविचार: सफलता का मार्ग

 
अस
विचारों को जिस दिशा में लगा दिया जाता है उसी ओर प्रगति होने लगती है। विचार रचनात्मक होंगे तो सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। भगवान ने तो मनुष्य को ज्ञान और विचार की सम्पदा देकर भेजा है। उस ज्ञान और उन विचारों को यदि ईर्ष्या, द्वेष, शत्रुता और निराशा में लगाया जाये तो विचार शक्ति का अपव्यय होता है और उसका अहित कर परिणाम मनुष्य को भोगना ही पड़ता है। हमारे दुखों का सबसे बड़ा कारण हमारे कुविचार हैं। कुविचार मन को अपवित्र बना देंगे, मन अपवित्र होगा तो हम दूसरों के सुखों और उन्नति को देखकर कुढ़ते रहेंगे, ईष्र्या में जलते रहेंगे। ईर्ष्या मनुष्य को भयंकर पतन की ओर ले जाती है, उससे बचने का उपाय मनुष्य को अवश्य करना चाहिए, जो मात्र विवेक से ही सम्भव है और विवेक में वृद्धि करने के लिए सर्वहितकारी सत्पुरूषों का संग, ऋषि-मुनि, परोपकारी, महापुरूषों के द्वारा रचित सद्ग्रंथों का श्रवण, पठन, मनन और चिंतन करना चाहिए। नित्य परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना रोगी मन को निरोग बनाने की सर्वोत्तम चिकित्सा है।

 

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