अनमोल वचन

 
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कहा गया है कि 'क्षमा तुल्यम् तपोनासि।' अर्थात क्षमा के समान अन्य कोई तप नहीं। क्षमा ही श्रेष्ठतम तप है, क्योंकि तप में अन्न, आहार त्याग शर्त है और क्षमा में बैर, शत्रुता त्याग शर्त है। अन्न, आहार का त्याग कर देना बड़ी बात नहीं, किन्तु बैर का, द्वेष का, शत्रुता का त्याग बहुत बड़ी बात है। यह हर व्यक्ति के लिए सम्भव है ही नहीं। किसी ने आपको गाली दी, आपका अपमान किया, आपका अहित किया, उसके प्रति आपके मन में विष संचित हो जाता है और यही विष एक ग्रंथी बनकर बैर के रूप में आपके मन में संचित हो जाता है। उस विष का वमन कर देना क्षमा है। ''मैं सब जीवों से क्षमा मांगता हूं, सब मुझे क्षमा करें। केवल इस सूत्र को दोहराकर आप क्षमा को नहीं जी सकते। क्षमा शब्द का नहीं हृदय का विषय है। सूत्र के शब्दों को आप दोहराये या न दोहराये उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता, आपके हृदय पर अंकित द्वेष धुला कि नहीं धुला यह बात महत्वपूर्ण है। हृदय में संचित बैर का विष धुल गया तो आप क्षमा को उपलब्ध हो गये। बैर का विष नहीं धुला तो एक सूत्र नहीं पूरे शास्त्र पढ़ जाये क्षमा सार्थक न होगी। क्षमावाणी पर्व का यही संदेश है।

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