अनमोल वचन

 
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मनुष्य का यह सोचना कि वे अपने कर्मों और पुरूषार्थ के अनुसार ही सब कुछ प्राप्त कर रहे हैं, प्रभु कृपा का कोई अर्थ नहीं, उनकी यह भारी भूल है। यह ठीक है कि पुरूषार्थ के बिना कुछ नहीं मिलता, किन्तु प्रभु की कृपा के बिना तो परिश्रम भी व्यर्थ हो जाता है। प्रभु की कृपा से ही पुरूषार्थ सार्थक होता है। शुभ संस्कारों से शुभ इच्छाएं तो नि:संदेह बनती है, किन्तु उन्हें सही दिशा प्रभु कृपा से ही प्राप्त होती है। उनको क्रियारूप प्रभु कृपा से मिलता है। कृषक भूमि तैयार कर बीज बो सकता है, पानी सींच सकता है, खाद आदि दे सकता है, समय पर गुड़ाई कर सकता है, परन्तु उसका उगना, बढऩा, पकना, अनाज कम या अधिक होना सब उसकी कृपा से है। उसकी कृपा के बिना सब विवश हैं। इसलिए शुभ कार्यों को करने के लिए मिली प्रेरणा को प्रभु की कृपा का फल समझो। कभी-कभी यह भी देखने में आता है कि मनुष्य को उसकी क्षमता, योग्यता, पुरूषार्थ बल और बुद्धि से इतना अधिक मिल जाता है कि वह स्वयं भी चकित रह जाता है। देखने वाले उसे प्रभु की कृपा ही कहते हैं। प्रभु की इन कृपाओं के लिए सदैव उसका धन्यवाद करते रहना चाहिए। उसे कभी न भुलाना चाहिए। भुलाना कृतघ्रता है। याद रखे कृतज्ञता मनुष्य को बढ़ाती है और कृतघ्नता घटाती है।

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