अनमोल वचन

 
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विपत्तियों से उबरने के जब सारे सत्प्रयास असफल हो जाते हैं तो विवेकी पुरूष उस परमसत्ता (परमात्मा) के आश्रय में चला जाता है। वही एक मात्र सहारा रह जाता है। उस समय परमशक्ति पर हमारा विश्वास आस्तिकता का आधार बन जाता है। उसका आश्रय ही हमें बल प्रदान करता है। वास्तव में वह परम शाश्वत अस्तित्व भले ही चाहे हम उसे जिस नाम से पुकारे व जीव मात्र का एक ऐसा साथी है, जो सदा साथ रहने वाला है। सदा से मिला हुआ है, आज भी प्राप्त है और आगे भी सदैव साथ रहकर प्राप्त बना रहेगा। सभी परमात्मा के ही अंश है, इसलिए प्रत्येक का सम्बन्ध अमिट और अपरिवर्तनीय रूप से भगवान के साथ बना हुआ है। इसी से जीव चेतन बना रहता है। उसी का आश्रय जीव को विश्राम प्रदान करता है। प्रभु प्राप्ति की इच्छा है तो जगत को जगत रूप में न देख कर भगवत रूप में देखिए। समस्त जगत को भगवत रूप में देखने का भाव ही आस्तिकता है। ऐसी स्थिति में जीव को कण-कण में भगवान की सत्ता की अनुभूति होने लगती है, संसारी को संसार दिखाई पडता है, जबकि सच्चे आस्तिक को सर्वत्र, सदैव और सबमें भगवान का प्रतिबिम्ब दिखाई पडता है।

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