अनमोल वचन

 
न
परमात्मा को मानो चाहे न मानो, साकार की उपासना करो चाहे निराकार की करो, केवल विवेक के प्रकाश में जो त्याज्य है उसका त्याग कर दिया तथा सब वृत्तियों को बाहर से समेट कर भीतर उद्गम के केन्द्रीभूत कर दिया तो मानो उपासना हो गई समझो जीवन सफल हो गया। जीवन क्या है, जीवन का तात्पर्य है सत्य शिवम् सुन्दरम् की सच्चे अर्थों में अभिव्यक्ति। ऐसे जीवन में निराशा का कोई स्थान नहीं, बल्कि सब दुखों का अन्त हो जायेगा। आनन्द और प्रेम का अनुभव ऐसे ही जीवन में हो पाता है। सत्य के मार्ग को अपना लो, क्योंकि सत्य ही शिव होगा और सत्य ही सुन्दर होगा। सत्य के आधार पर आस्था, श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रभु की सत्ता को स्वीकार करो। परमात्मा को जैसा हमने सुना है वह वैसा भी है, जैसा हम पसंद करते हैं वह वैसा भी है। उसे जैसा दूसरों ने अनुभव किया वह वैसा भी है और उन सबसे विलक्षण भी। जब परमात्मा अनन्त गुणों वाला है तो फिर क्यों हम उसे सीमा में बांधना चाहते हैं। वह तो सीमाओं से परे है। उसकी सत्ता, उसकी महिमा और उससे अपना आत्मीय सम्बन्ध स्वीकार कर लेने मात्र से उसकी विभूतियों का दिग्दर्शन अनुभूत होने लगता है। जीवन की नीरसता समाप्त हो जाती है, आनन्द की अनुभूति और रस का संचार होने लगता है।

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