अनमोल वचन

 
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क्रियाशक्ति, विचारशक्ति और भावशक्ति मानव मात्र को प्राप्त है। क्रियाशक्ति के सदुपयोग का नाम है सेवा। विचारशक्ति के सदुपयोग का नाम है त्याग। भावशक्ति के सदुपयोग का नाम है प्रेम, जिसने परमात्मा की दी हुई शक्तियों का सदुपयोग किया उसी ने जीवन को सार्थक किया, जीवन के उद्देश्य को पूर्ण किया। सेवा अर्थात सभी के प्रति सहयोग और सद्भाव। त्याग अर्थात अपने जाने हुए असत का त्याग। प्रेम अर्थात केवल प्रभु को अपना मानना उसके प्रेम में अपने को समर्पित कर देना। सेवा के द्वारा मनुष्य धर्मात्मा बनता है, त्याग के द्वारा जीवन मुक्त होता है और प्रेम के द्वारा ईश्वर भक्त होता है। सेवा का स्रोत करूणा में है, जिस हृदय में परपीड़ा देखकर करूणा उमड़ती है, उसी से सेवा बनती है। करूणा प्रभु प्रेम के समान ही अलौकिक तत्व है, जिसका कभी नाश नहीं होता। परपीड़ा की अनुभूति जिसके हृदय में होती है, वहीं ईश्वर भक्त हो सकता है, प्रभु के प्यार का सही अधिकारी भी वही होता है, जो संवेदनहीन है, जो दूसरों के दुख, पीड़ा, कष्ट देखकर द्रवित नहीं होता, ऐसे हृदयहीन व्यक्ति ही तो नास्तिक होते हैं।

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