अनमोल वचन

 
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मन का स्वभाव चंचलता है और वह चंचलता ही उसे टिकने नहीं देती। वह चक्कर काटता रहता है। सबसे महत्वपूर्ण उस पर नियंत्रण करना, उसे सही दिशा देना, क्योंकि वह रथ में जुते घोडों के समान है। अनियंत्रित होने पर सवार को गड्ढे, तालाब, नदी अथवा खाई या किसी भयानक स्थान में गिरा कर उसका पतन कर सकता है। पहले अपना लक्ष्य निश्चित करो तब उसे दिशा प्रदान की जाये। प्रक्रिया सुनिश्चित की जाये, तभी उस लक्ष्य को पाने के लिए प्रयासरत हुआ जाये, तभी मन सही दिशा में चल पायेगा। मन को एकाग्र कर उसी में केन्द्रित करें, जो कठिन तो है, पर असम्भव नहीं। हमारा शरीर मंदिर में हो और मन सांसारिक कार्यों में लगा हो, तो वास्तव में हम मंदिर में न होकर वहां है, जहां हमारा मन है। इसके विपरीत सांसारिक कार्य करते हुए भी यदि मन निरन्तर प्रभु चिंतन में लगा हो, हम यह समझे कि हम अपना नहीं भगवान का कार्य कर रहे हैं, तो हम प्रभु में ही हैं।

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