अनमोल वचन

 
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धर्म शास्त्रों में लक्ष्मी (धन) की तीन गति बताई गई है। दान, भोग, नाश अर्थात कमायी लक्ष्मी (धन) के कुछ भाग को अच्छे कार्यों और सुपात्रों को दान दें अथवा परोपकार में लगाये। उसके पश्चात अपने जीवन निर्वाह हेतु व्यय करे उसका सदुपयोग करें अन्यथा वह विविध कष्टदायी मार्गों से नष्ट हो जायेगी। दान को भोग से पहले स्थान दिया गया है, किन्तु अधिकांश व्यक्ति दान के विषय में कभी सोचते तक नहीं, अपने तक सीमित रहते हैं। दान को अपना अनिवार्य और पुनीत कर्तव्य तो कुछ लोग ही मानते हैं। अधिकांश तो अपना समाज में नाम ऊंचा हो, लोग उन्हें पुण्यात्मा समझे,इस कारण दान करते हैं। अपना पुनीत कर्तव्य मानकर नहीं। ऐसे इंसान मंदिरों, मस्जिदों, गुरूद्वारों, धर्मशालाओं तथा विद्या के मंदिरों में दान देते हैं, तो वहां अपने नाम का पत्थर लगवा देते हैं। वे प्रभु की बड़ाई करना चाहते हैं या अपनी। वे अहम के त्याग के लिए दान करते हैं या अहम को बढ़ावा देने के लिए वे जाने। दान में स्वार्थ नहीं, परमार्थ की भावना का होना आवश्यक है। दान तो वह है कि दायां हाथ दान करें और बायें हाथ को भी उसका ज्ञान न हो। दान में अहंकार न हो, उसके लिए दान करते समय हृदय से प्रभु का धन्यवाद करे कि उसने आपको इस पुण्य कार्य के माध्यम बनने के योग्य तथा सक्षम बनाया।

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