अनमोल वचन

 
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श्रद्धापूर्वक परमात्मा की भक्ति करने से इस यथार्थ  के दर्शन होते हैं कि समस्त ब्रह्मांड का संचालक सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ परमात्मा है। अल्पज्ञ और अल्पशक्ति जीव नहीं। जब जीवात्मा स्वयं परमात्मा के अधीन है तो कर्ता भाव उसमें पैदा ही नहीं होना चाहिए। यह भाव उसमें अहंकार पैदा कर देगा, अज्ञानता आयेगी, आन्तरिक क्लेश भी पैदा होंगे। इससे भिन्न अज्ञानी व्यक्ति अपने अशुभ कार्यों का उत्तरदायी परमेश्वर को मानकर स्वयं को उसके फल से मुक्त रहने की कल्पना करेगा। उसका चिंतन यह रहता है कि जब परमात्मा की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो मैं जो कुछ भी कर रहा हूं वह भी परमात्मा की इच्छा से ही कर रहा हूं, परन्तु यथार्थ  को समझने के लिए यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रभु ने फल अपने अधीन रखते हुए, जीव को कर्म करने के लिए स्वतंत्र किया हुआ है। जीव अपनी इच्छानुसार कर्म करने में तो स्वतंत्र है, परन्तु उसका फल ईश्वरीय न्याय व्यवस्था के अनुसार ही उसे भोगना होगा। शुभ कर्मों का शुभ और अशुभ कर्मों का अशुभ। इसलिए कर्म करने से पहले परमेश्वर द्वारा जीव को कर्म करने की स्वतंत्रता, उसकी न्याय व्यवस्था के अनुरूप, उसके शुभ अशुभ फल के विषय में गम्भीरता से विचार कर ही, कोई कर्म करना चाहिए अन्यथा परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई स्वतंत्रता का यदि दुरूपयोग किया गया तो उसका फल जन्म जन्मान्तरों तक दुख के रूप में भोगना पड़ेगा।

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