अनमोल वचन

 
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अहंकार से अहंकार की वृद्धि होती है। अहंकारी का जीवन अशान्तिमय, दुखमय तथा अंधकारपूर्ण होता है। परमात्मा के प्रति आत्मसमर्पण करने वाले भक्त, योगी तथा कर्मयोगी निष्काम भाव से कर्म करके अहंकार को क्षीण कर देते हैं। यदि कर्म करते समय परमात्मा तत्व का स्मरण बना रहेगा तो मन में अहंकार का भाव पैदा ही नहीं होगा। इसलिए अनासक्त रहकर कर्म पथ पर चलते रहो। जिस प्रकार क्रोध के कारण जीव के स्वभाव में विकृति आ जाती है उसके कर्म भ्रष्ट हो जाते हैं, विभिन्न प्रकार के दुख तथा क्लेश भोगने पड़ते हैं, उसी प्रकार अहंकार, लोभ, ईर्ष्या आदि दूषित भावों से भी जीव के स्वभाव में विकृति आ जाती है। उसमें तृष्णाएं जाग उठती हैं। विभिन्न प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। तृष्णा रूपी आग ने मनुष्य के मनुतत्व को भस्म कर दिया है। अमृत से भी उसके शांत होने की आशा नहीं है। जैसे पागल घोड़ा यहां से वहां दौड़ता फिरता है वैसे ही यह अहंकार, लोभ, ईर्ष्यद्वारा जनित तृष्णाएं भी दिशाओं-दिशाओं में भ्रमण करती रहती हैं। दृढ़ संकल्पों के द्वारा ही इनके दोष जाल से बचना सम्भव है।

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