अनमोल वचन 

 
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हम अपने-अपने धर्म और सम्प्रदाय के अनुसार काशी को तीर्थ मानते हैं, काबे को तीर्थ मानते हैं, मानसरोवर कैलाश को तीर्थ मानते हैं। प्रयाग को तीर्थ मानते हैं, परन्तु वास्तव में केवल ये ही तीर्थ नहीं हैं। नदियों, सरोवरों में स्नान तथापवित्र स्थलों के दर्शन तथा यात्रा तीर्थ नहीं हैं, बल्कि सत्य भाषण, सत्य विद्या की प्राप्ति, सच्चे योगियों, सन्यासियों तथा सच्चे चरित्रवान  धर्म उपदेशकों के सत्संग तीर्थ हैं। माता-पिता गुरूजनों की सेवा तीर्थ हैं। योगाभ्यास, विद्या दान, पुरूषार्थ, परोपकार यज्ञादि शुभ कर्म ही तीर्थ हैं। इन्हीं के द्वारा सुख सागर से पार उतरना सम्भव है। यदि हम ईश्वरीय नियमों के पालन में उदासीन हैं, सत्याचरण, सदव्यवहार , माता-पिता की सेवा की उपेक्षा करते हैं। दान, यज्ञ तथा परोपकार के कार्य नहीं करते, प्रभु स्मरण से विमुख रहते हैं। स्वाध्याय तथा सत्संग नहीं करते, दुखियों, पीड़ितों की सेवा नहीं करते तो हमारे इन तीर्थों की यात्रा व्यर्थ है। इनका कोई पुण्य तथा शबाब हमें प्राप्त होने वाला नहीं है।

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